Administration of Gupta Empire :1 of the golden era of India

Administration of Gupta Empire- गुप्त साम्राज्य की प्रशासन पद्धति

नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका आज के इस पोस्ट Administration of Gupta Empire गुप्त काल में। आज के समय में ज्यादातर देशो में लोकतान्त्रिक व्यवस्था देखने को मिलती है। मौजुदा समय में प्रशासनिक कार्यो को चलाने के लिए हम मतदान के द्वारा अपना शासक चुनते है।

वही प्राचीन काल की बात करे तो यह व्यवस्था राजतंत्रात्मक हुआ करती थी। राजा का पद वंशागत हुआ करता था। सारी शक्तियाँ राजा के पास हुआ करती थी। चाहें वह मौर्य काल हो या गुप्त काल।

दोनों में हमें राजतंत्रात्मक व्यवस्था देखने को मिलती थी। लेकिन फिर भी दोनों में बहुत असमानता थी। गुप्त काल की बात करे तो शुरुवाती समय (चन्द्रगुप्त प्रथम,समुन्द्रगुप्त,चन्द्रगुप्त द्वितीय,कुमारगुप्त आदि ) तक यह व्यवस्था केन्द्रीकृत थी।

परन्तु उसके बाद की प्रशासनिक व्यवस्था विकेन्द्रित हो गई। सामंती व्यवस्था का विकास होने लगा। जिसके फलस्वरूप राजा के अधिकारों में कमी होने लगी। शक्तियाँ कई भागों में विभक्त होने लगी। जो गुप्त साम्राज्य के पतन का कारक भी सिद्ध हुई। तो चलिए गुप्त साम्राज्य के प्रशासनिक, वैज्ञानिक तथा कलात्मक पहलुओं को समझने का प्रयास करते है।

Administration of Gupta Empire-Types of Administration

गुप्त साम्राज्य की प्रशासन पद्धति राजतंत्रात्मक थी । गद्दी वंशगत थी । परंतु यह आवश्यक नहीं था की गद्दी हमेशा जेष्ठ पुत्र की मिलती थी । इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी । गुप्तवंश में दो प्रकार की शासन पद्धति चला करती थी । पहली प्रांतीय और स्थानीय राज्य कई प्रांतो मे विभाजित था । प्रांत के प्रभारी को उपरिक कहते थे । तथा प्रांत कई जिलों मे विभक्त था । जिसके प्रभारी को विषयपति कहते थे । प्रत्येक विषय को वीथियों मे तथा प्रत्येक विथिया ग्राम मे विभाजित थी

  • पेठ -यह ग्राम् समूह की ईकाई थी । यह ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई थी ।
  • ग्राम् सभा -ग्राम् के कार्यों का संचालन ग्राम् सभा द्वारा होता था।
  • जिसके मुखिया को ग्रामिक कहा जाता था।
  • सदस्य महतर कहलाते थे ।
  • ग्राम सभा को पंचमडली तथा ग्राम जनपद से संबोधित किया जाता था ।
  • गोप्ता – इसकी नियुक्ति सीधे सम्राट के द्वारा होती थी जो प्रशासन का कार्य देखता था ।
  • सैन्य संगठन – सम्राट सेना का अध्यक्ष होता है। युवराज जो सम्राट का पुत्र होता है।
  • वह सम्राट के वृद्ध होने पर सेना की कमान सभालता है ।
  • सेना को तीन भागों मे विभाजित किया जाता था।
  • गज सेना – इसका प्रधान अध्यक्ष महापीलुपति होता है।
  • अश्व सेना-इसका प्रधान अध्यक्ष महाश्पति होता था।
  • रणभाणडाधिकृति– जो सेना को लड़ाई मे काम आने वाली साम्रगी की व्यवस्था करता है ।
सन्धिविग्रहकसंधि और युद्ध का मंत्री
कुमारामात्यगुप्त साम्राज्य के सबसे बड़े अधिकारी
खाधत्पाकिकाराजकीय भोजनालय का अध्यक्ष
महादण्डनाकयन्यायधीश
धूर्वाधिकरणभूमिकर बसूलने वाला प्रमुख अधिकारी
समुन्द्रगुप्त के पदाधिकारी

Administration of Gupta Empire- सामाजिक जीवन

गुप्त काल में भारतीय समाज 4 भागों मे विभाजित था । ब्राह्मण,क्षत्रिय,शूद्र,वैश्य । कायस्थ का उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति तथा गुप्त कालीन अभिलेख से प्राप्त हुआ है । इस काल मे शूद्रों की स्थिति मे सुधार आया और उन्हे माहकाव्य जैसे -रामायण,महाभारत आदि को सुने का अधिकार मिला ।

इन्की पहचान किसान के रूप मे भी होने लगी । समाज मे छुआ- छूत प्रचलित था । स्त्रियों की दशा मे बहुत असमानता थी । स्त्री दो भागों मे विभाजित थी एक वर्ग को जीवन निर्वाह के लिए अर्जन की आजादी थी वही दूसरी को आजादी नहीं थी ।गुप्त शासक बहु विवाह का उल्लेख मिलता है । चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा कुमारगुप्त प्रथम की अनेक पत्नियों का उल्लेख मिलता है। भानुगुप्त के एरण अभिलेख मे सती प्रथा का उल्लेख मिलता है । स्मृतिकार कात्यायन के अनुसार स्त्री अपना स्त्री धन बेच सकती थी । समाज मे वेश्यावृति का भी चलन था। इन्हे गणिका से संबोधित किया जाता था ।

Administration of Gupta Empire-धार्मिक जीवन

इस काल मे भागवत धर्म अपने चरम मे था । तथा गुप्त शासक वैष्णव धर्मवलंबी थे । इस समय बौद्ध धर्म को राजा की सहायता मिलना कम हो गया था ।और त्रिदेव की पूजा होने लगी थी ।

गुप्त काल मे मूर्ति पूजा ब्रह्मणीय धर्म का समान्य लक्षण हो गया। गुप्त वंश का राजकीय चिन्ह गरुड़ था,जो चन्द्रगुप्त दितीय और समुन्द्रगुप्त के समय उनके सिक्कों पर आकित हुआ करता था । गुप्त वंश मे मथुरा एवम् वल्लभी मे जैन सभा आयोजित हुई थी ।

हरिहर के रूप मे शिव को विष्णु के साथ दिखाया गया है, जो यह दर्शाता है की वैष्णव और शैवधर्म के समन्वय को दिखाता है । गंगधर अभिलेख मे विष्णु को मधुसूधन से संबोधित किया गया था । झाँसी में दशावर मंदिर वैष्णो धर्म के महत्वपूर्ण अवशेष है । यह पंचायतन श्रेणी का मंदिर है । 

मंदिरस्थान
धम्मेख स्तूपसारनाथ (उत्तर प्रदेश )
शिव मंदिरभूमरा (मध्य प्रदेश )
पार्वती मंदिरनचनाकुठार (मध्य प्रदेश )
दशावतार मंदिरदेवगढ़ (उत्तर प्रदेश )
भितर गाँव मंदिरकानपूर(उत्तर प्रदेश )
विष्णु मंदिरजबलपुर (मध्य प्रदेश )
विष्णु मंदिरउदयगिरि (विदिशा )
शिव मंदिरअहिच्छत्र (उत्तर प्रदेश )
लक्ष्मण मंदिरसिरपुर
प्रमुख मंदिर

Administration of Gupta Empire-आर्थिक जीवन

गुप्तकाल आर्थिक से बहुत रूप ही समृद्ध था । क्योंकि अर्थव्यवस्था,व्यपार,खेती और विकसित उधोग गुप्तकाल के समृद्ध के कारक थे । जिनका पता गुप्तकालीन  मुद्राओ,अभिलेख से पता चलता है । इस काल मे पाँच प्रकार की भूमि का उल्लेख मिलता है।

  • क्षेत्र भूमि -जो कृषि कार्यों के लिए हुआ करती थी ।
  • वास्तु भूमि – जो रहने के लिए होती थी ।
  • चारागाह भूमि-जो पशुओ को चरने के लिय हुआ करती थी । 
  • खिल भूमि -जोतने योग्य भूमि को खिल भूमि कहते थे ।
  • अप्रहत भूमि -जंगली भूमि जो खेती के लायक नहीं होती थी ।

कर व्यवस्था –

आय का मुख्य स्रोत भू राजस्व था । भूमि कर के रूप मे 1/4 से लेकर 1/6 भाग लिया जाता था । भूमि कर संग्रह करने वाला पदाधिकारी को ध्रुवाधुकरण कहलाता था । इस काल मे व्यपरियों और शिल्पियों के चार संगठन थे । निगम,पग,गण,श्रेणी

श्रेणी के प्रधान को ज्येष्ठक कहा जाता तथा व्यपारिक कार्यों के संचालक को साथ्रवाह कहलाते थे । सिचाई के लिए राहत या घटयन्त्र का प्रयोग होता था । भूमि विवाद के सुलझाने वाले अधिकारी न्यायधीकरणी कहे जाते थे ।

भूमि अभिलेख को सुरक्षित रखने का काम करणिक दवार होता था । बंदरगाह -बंदरगाह दोभागों मे विभक्त था । पूर्वी भारत -ताम्रलिप्ती ,घंटशाला पश्चिमी भारत -भृगुकच्छ,सोपारा,कल्याण । इस समय उज्जैन व्यपार का प्रमुख केंद्र था ।

उपरिकप्रान्त के राजयपाल
कुमारामात्यप्रशासनिक अधिकारी
दण्डपाशिकपुलिस विभाग का प्रधान
महादण्डनायकमुख्य न्यायधीश
बलाधिकृतसैन्य कोष का अधिकारी
महाप्रतिहारमुख्य दौवारिक
चन्द्रगुप्त द्वितीय के पदाधिकारी

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गुप्त युग मे वैज्ञानिक प्रगति –

गुप्तकाल मे आर्यभट्ट प्रसिद्ध गणितज्ञ थे । इन्होने अपनी पुस्तक आर्यभट्टीय मे पृथ्वी को गोल बताया था। तथा उसकी परिधि का सही अनुमान लगाया था । आर्यभट्ट मे दशमलव प्रणाली का वर्णन है । दशागीतिक सूत्र और आर्यष्टक आर्यभट की अन्य रचना है ।

वराहमिहिर ने अपने ग्रंथ पंच सिद्धांनित्का मे पाँच प्राचीन सिद्धांतों पैतामह,रोमक,पोलिस,वशिष्ट तथा सूर्य का निरूपण किया है । ब्रहागुप्त ने ब्रह्मसिद्धांत की रचना की थी । सुश्रुत ने आयुवैदिक चिकित्सा मे महत्वपूर्ण अनुसंधान किए ।

धन्वंतरि जिन्हे भारतीय आयुर्वेद का पिता कहा जाता है वह गुप्त काल के समय के ही थे । भास्कर ने तीन ग्रंथ की रचना की थी । महाभास्कय्र, लघुभासकर्य ,भाष्य । लाटदेव को सूर्य सिद्धांत गुरु कहा जाता है ।

भागराजा को भूमि उत्पादन से होने वाला हिस्सा
भोगराजा को उपहार में मिलने वाला कर
उदरंगस्थाई काश्तकारों के लिए कर
उपरिकरस्थाई किसानो के लिए कर
हिरण्यनगद रूप में लिया जाने वाला कर
विषिटनिः शुल्क
दीनारस्वर्ण मुद्राए
अग्रहारमंदिरो या ब्राह्मण को दी जानें वाली भूमि
आर्थिक शब्दावली

गुप्त कला –

गुप्त काल मे गुप्त कला अपने चरम पर थी । इस काल मे बनी मंदिरों की वास्तुकला उतम उदाहरण है । जिसमे शिखरयुक्त मंदिर प्रमुख है । पवाया का मंदिर,नागोद मे खोह का मंदिर शंकरमढ़ का मंदिर (जबलपुर ) वास्तुकला का उतम उदाहरण है ।

गुप्तकाल मे चित्रकारी भी अपने चरम पर थी। अजंता की चित्रकला,अजंता की गूफाए,महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले मे स्थित है। 29 गुफाओ मे से 19 गुफा गुप्त काल से संबंधित है । गुफा संख्या 16 मे मरणासन्न राजकुमारी की अद्भुत चित्रकारी है ।

गुफा संख्या 17 मे जातक कथाओ का वर्णन देखने को मिलता है । इसी गुफा मे बुद्ध को यशोधरा से भिक्षा मगते हुए तथा यशोदा को अपने पुत्र राहुल को सोपते हुए दिखाया गया है। इस गुफा मे सिंहल के राजदरबार का भी चित्र है। जिसे चित्रशाला भी कहा जाता है । अजंता की गुफाओ का चित्र महायान शाखा से संबंधित है ।

बाघ की गुफ़ाएं –

मध्य प्रदेश के चार जिले मे विंध्य पर्वत को काटकर बाघ की गुफाओ का निर्माण हुआ है । जो बहुत ही अद्भुत और लोकिक तथा धर्मनिरपेक्ष है ।

गुप्तकालीन साहित्य –

गुप्तकाल संस्कृत साहित्य का स्वर्ण युग है । कालिदास चन्द्रगुप्त दितीय के दरवार मे रहते थे । जिन्हे भारत का शेक्सपियर भी कहा जाता है । यह संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध कवि थे ।

याज्ञवलवय स्मृति,कात्यायन स्मृति,बृहस्पति स्मृति और पराशर स्मृति की रचना गुप्तकाल मे हुई । वीरसेन उदयगिरी गुहा लेख के रचनाकार थे । मंदसोर प्रशासित की रचना वत्सभट्टी ने की थी । 

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