अलंकार:जानें अलंकार तथा अलंकार के 2 प्रमुख भाग!

अलंकार किसे कहते है तथा इसका महत्व –

दोस्तों स्वागत है आपका आज के इस पोस्ट अलंकार में – सुंदरता सभी के जीवन में अपना महत्व रखती है। हर किसी को चाहें वह प्रकृति हो या शरीर की सुंदरता हो(गहनों से ) या फिर चित्रकारी की, (रंगों से) या फिर संगीत की (वाद्य यंत्रों से) या फिर प्रकृति की (पेड़ पौधों झरनों से) सभी अपने अपने स्तर पर सुंदरता को निखारने की कोशिश में रहते हैं।

ठीक इसी प्रकार भाषा में भी शब्दावली का प्रयोग किया जाता है, जिससे भाषा की सुंदरता को बढ़ाया जाए। इसका इस्तेमाल कविताओं में, लेखों में,भाषणों में या अन्य रचनाओं में, कभी वर्णों के द्वारा कभी शब्दों के द्वारा या फिर किसी विशेष शब्दावली के द्वारा सुंदरता को उभारने का प्रयास किया जाता है। इसी को व्याकरण की भाषा में अलंकार कहते हैं। सुप्रसिद्ध रचनाकार रसखान के शब्दों में कहें तो अलम करोति इति अलंकार अर्थात जो सुंदरता बढ़ाए उसे अलंकार कहते हैं। 

अलंकार के भेद शब्दालंकार और अर्थालंकार-

शब्दालंकार जब किसी कथन में शब्द का प्रयोग के कारण उसकी सुंदरता उत्पन्न हो तो उसे शब्दालंकार कहते हैं। शब्दालंकार को तीन भागों में बांटा जाता है। तथा किसी भी कथन में अगर उसकी सुंदरता अर्थ से निकले तो उसे अर्थालंकार कहते हैं इसके 5 प्रकार होते हैं। चलिए सब की विस्तृत चर्चा करते है।

शब्दालंकार के भेद

 यमक-

जब कोई शब्द दो बार या दो से अधिक बार आए परंतु हर बार उसका कहने का मतलब यानी अर्थ अलग हो तो वह यमक अलंकार की श्रेणी में आएंगे। जैसे काली घटा का घमंड घटा इसमें घटा मतलब बादल से तथा दूसरी घटा का मतलब कम होना के लिए इस्तेमाल हुआ है। अतः यह  यमक अलंकार है। कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, जो खाए बौराए,जो पाए बौराए। इसमें पहला कनक धतूरा तथा दूसरा का मतलब सोने के लिए हुआ है। तीन बेर खाती थी,वे तीन बार खाती थी। इसमें तीन बार खाने के लिए और दूसरा तीन बेर(फल) खाने के लिए आया है यमक अलंकार है।

श्लेष-

श्लेष का मतलब चिपकाना एक ही शब्द में एक से अधिक अर्थ चिपकाए हो वहाँ श्लेष अलंकार होता है। इसमें शब्द एक बार प्रयुक्त होता है परंतु उसके अर्थ एक से ज्यादा होते हैं। जैसे-रमन को देखी पट देत बार-बार है। पंक्ति में पट का अर्थ है कपड़ा और दरवाजा। पहले भाग में वह व्यक्ति किसी माँगने वाले को देखकर उसे बार-बार कपड़े देता है और दूसरे भाग में वह व्यक्ति किसी याचक को देखते ही दरवाजा बंद कर लेता है यही श्लेष अलंकार की विशेषता है। रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून। इन पंक्तियों में मोती मनुष्य और आटा के लिए पानी का अलग अलग महत्व है मोती के लिए चमक मानुष के लिए और चूना के लिए जल इस प्रकार इस प्रकार है,यह श्लेष अलंकार है। 

अनुप्रास

एक वर्ग की आवृत्ति के कारण उत्पन्न सौंदर्य को अनुप्रास अलंकार कहते हैं आवृत्ति शुरू में मध्य में या फिर अंत में कहीं भी हो सकती है जैसे –तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। इसमें त वर्ण की आवृत्ति होने से इसे अनुप्रास अलंकार कहेंगे। चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही है, जल थल में इसमे च और ल की आवर्ती  के कारण इसे भी अनुप्रास अलंकार की संज्ञा देंगे। सुरभित सुंदर सुखद सुमन तुम पर खिलते  हैं। इसमें सु वर्ण की आवृत्ति है। कल कानन कुंडल मोर पंख उर पर बनमाल  विराजति  है इस पंक्ति में क की आवृत्ति है। 

अर्थालंकार के भेद-

उपमा- जहाँ किसी व्यक्ति या फिर पदार्थ के रूप और गुण से संबंधित विशेषता व्यक्त करने के लिए दूसरी वस्तु या पदार्थ से समानता दिखाई जाए तो वह उपमा अलंकार कहलाएगी। इसमें सा,सी,से जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। उपमा अलंकार के चार अंग होते हैं।

  • उपमेय – जिनकी तुलना की जाए।
  • उपमान- जिससे तुलना की जाए।
  • साधारण धर्म- जिस सामान गुण के आधार पर स्थापित की गई हो।
  • वाचक -जो सादृश्यता बताएं।

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसा। इन पंक्तियों में प्रात नभ उपमेय है,शंख उपमान है, नीला साधारण धर्म है और जैसे वाचक है। उपमा अलंकार कहलाएंगे। उपमा के चारों भाग स्पष्ट भी हो सकते हैं और कोई  छिपा हुआ भी हो सकता है। अन्य उदाहरण देते हैं उषा सुनहले तीर बरसाती जयलक्ष्मी- सी उदित हुई। वे दीपशिखा- सी शांत भाव में लीन है

रूपक

जहां तुलना की जाती है लेकिन उसमें उपमेय और उपमान के अत्यंत समानता के कारण अभेद वर्णन होता है। वह रूपक अलंकार होता है उपमा में उपमेय और उपमान की अपनी-अपनी स्थितियों के अनुसार स्थिति रखती है जबकि रूपक  में दोनों में कोई अंतर नहीं रहता। मैया मैं तो चंद्र खिलौना ले हो। यहाँ कृष्ण चंद्र खिलौना लेने की जिद करते हैं यानी चंद्र उपमान में खिलौना उपमान का आरोपन है जिसमें यहां रूपक अलंकार होगा।

उत्प्रेक्षा

इसमें भी तुलना होती है किंतु यहां उपमेय में उपमान की संभावना की जाती है इसमें मनु, मानो, जनु,जानो, मनु, निश्चय आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। वह देखो मन के अंतराल से निकले मानो दो तारे क्षितिज जाल से निकले। (भरत शत्रुघ्न में दो तापमान की संभावना होने के कारण इसे उत्प्रेक्षा अलंकार की श्रेणी में रखते हैं )

अतिशयोक्ति- 

अतिशयोक्ति का मतलब है बढ़ा चढ़ाकर वर्णन करना। जब किसी कथन में विशिष्ट शब्द का प्रयोग के कारण उत्पन्न हो परंतु वह सीमा से बढ़कर हो तो वह अतिशयोक्ति अलंकार कहलाती है। जैसे- हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग। लंका सिगरी जरी गई गए निशाचर भाग।

मानवीकरण-

जब प्रकृति पर मानवीय गुण भावनाओं या फिर क्रियाओं को आरोपित किया जाए तब वह मानवीकरण अलंकार कहलाता है। जैसे –मेघ आए बड़े ठन बन के सवर के यहाँ बादलों को बंद कराने की बात कही गई है इसलिए मानवीकरण अलंकार आएगी। आसमान से उतर रही संध्या सुंदरी पर  धीरे-धीरे। सागर के ऊपर नाच करती हैं लहरें मधुर गाना। 

इन्हें भी जानें – Kriya-kriya kise kahte hai ?kriya ke bhed !

दोस्तों आज के इस भाग में हमने अलंकार की महत्व को जाना तथा इसके प्रकारों को उदाहरण के साथ सरल शब्दों में समझने का प्रयास आशा है यह भाग आपके लिए रोचक तथा ज्ञानवर्धक होगी धन्यवाद।

Leave a Comment