Pallavas and Chalukya dynasty-History of south Indian

Pallavas and Chalukya dynasty -पल्लव वंश,चालुक्य वंश

नमस्कार दोस्तों आज के इस पोस्ट में हम Pallavas and Chalukya dynasty की चर्चा करेंगे। दक्षिण भारत कहते ही जो पहला चित्र हमारे मन में उभरता है वह मंदिरों का शहर के रूप में हमारे सामने आता है। जहाँ की मंदिरों की कलाकारी तथा पत्थरों को तराश कर बिना सीमेंट, बिना ईंटों से बनी मंदिर देश से लेकर विदेश तक के लोगो को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहाँ की मंदिरों को यूनेस्को हेरीटेज साइट भी कहते हैं। तो चलिए आज के इस Pallavas and Chalukya dynasty में हम मंदिरों के अलावा दो महत्वपूर्ण वंशों की भी चर्चा करेंगे। 

पल्लव वंश पव की उत्पत्ति –

पल्लव वंश की उत्पत्ति के विषय में कई मत है। कोई इन्हें स्थानीय तो कोई इन्हें पार्थियन (parthian) ट्राइब भी कहते हैं । संगम साहित्य की माने तो मनिमेकलाई के अनुसार पल्लवों की उत्पत्ति चोल वंश के राजकुमार तथा नागवंश की राजकुमारी से उत्पन्न हुआ है। जिन्होंने इक्षवाकुओ को अपदस्थ कर उनकी जगह ली। पल्लव का शाब्दिक अर्थ लता है। यह टोडाई का रूपांतरण है। जो लता का पर्यायवाची है। इसलिए इससे यह प्रतीत होता है कि यह स्थानीय जनजाति थी। जिन्होंने लताओं के देश में अपनी सत्ता स्थापित की। इन्होंने अपनी राजधानी काँची(काँची पुरम) में बनाया। 

प्रमुख पल्लव शासक

पल्लव वंश के संस्थापक की बात करे तो वप्पदेव इसके संस्थापक थे। परन्तु सिंह विष्णु पहले महत्वपूर्ण राजा थे। पुरातात्विक स्रोतों की माने तो यह वैष्णव थे। किराताजुर्नियम तथा दशकुमारचरितम के लेखक सिंह विष्णु के दरबार में रहते थे। 

महेन्द्रवर्मन -इस वंश का उत्कर्ष महेन्द्रवर्मन प्रथम के शासन के साथ शुरू हुआ। इनके समय पल्ल्वों तथा चालुक्यों के बीच अत्यंत लंबा संघर्ष शुरू हुआ। इन्होंने मतविलास प्रहसन की रचना के साथ साथ वास्तुकला में मंडप शैली की भी शुरुआत करवाई। यह शुरुआत में तो जैन धर्म को मानने वाले थे। परन्तु बाद में नयनार संत अप्पार से प्रभावित होकर इन्होंने शैव धर्म को अपना लिया। 

नरसिंह वर्मन– इन्होंने पुलकेशिन द्वितीय की हरा कर बादामी पर अधिकार किया तथा इन्होंने वातापीकोणडा (वातापी को जीतने वाला) की उपाधि धारण की। इन्होंने ही मामल्लपुरम नामक शहर बसाया। जिसे आज के समय में महाबलीपुरम के नाम से जाना जाता है। इन्हीं के शासनकाल में ह्वेनसांग ने कांची की यात्रा की थी। 

नरसिंह वर्मन द्वितीय– इनके शासन में शांति समृद्धि तथा मंदिरों का निर्माण हुआ। इन्होंने कांची के कैलाशनाथ मंदिर का भी निर्माण कराया। 

नंदी वर्मन द्वितीय- यह वैष्णव धर्म अनुयायी थे। इन्होंने राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग की पुत्री रेवा से शादी की।

अपराजित– यह पल्लवों के अंतिम शासक थे। इनके शासनकाल में चोल शासक आदित्य चोल ने अपराजित पल्लव पर आक्रमण कर पल्लव राज्य को अपने अधीन कर लिया था।

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 Pallavas and Chalukya dynasty चालुक्य वंश-

पुलकेशिन प्रथम- राजा जयसिंह चालुक्य वंश के संस्थापक थे। चालुक्य वंश का उत्कर्ष पुलकेशिन प्रथम के समय हुआ। इन्होंने बीजापुर के निकट वातापी या बादामी को अपनी राजधानी बनाई थी। 

कीर्तिवर्मन प्रथम- इन्होंने कदंम्बो को साफ कर और गोवा पर अधिकार कर लिया था। 

पुलकेशिन द्वितीय (609- 642 ईसा )-यह महान शासक था। इन्होंने ही हर्ष के विजय अभियान को नर्मदा नदी के तट पर रोका था। साथ ही साथ ऐहोल अभिलेख लिखवाया था। जो संस्कृत और ब्राह्मी लिपि में है ।

वेंगी के चालुक्य- विष्णुवर्धन ने वेंगी के चालुक्य वंश की स्थापना की। यह पुलकेशिन द्वितीय के भाई थे। इसके महत्वपूर्ण शासक- विजयादित्य, विष्णुवर्धन, विजयादित्य  द्वितीय दो विजयदित्य तृतीय,गुनग, भीम प्रथम आदि थे। 

कल्याणी के चालुक्य -इसकी स्थापना तैलप द्वितीय ने की थी। इसने राजकूट राजा कर्क द्वितीय को मारकर इसकी स्थापना की थी। इसकी राजधानी मान्यखेट थी। सोमेश्वर द्वितीय ने मान्यखेट से हटाकर कल्याणी को अपनी राजधानी बना लिया।

विक्रमादित्य षष्ठी  – इस वंश के महान शासक थे। विक्रमांकदेवचरित के लेखक विल्हन तथा मिताक्षेरा के लेखक ज्ञानेश्वर का उनका प्रश्न मिला हुआ था। 

सोमेश्वर- इनके काल में राज्य बिखरने लगा था। इन्होंने मानसोल्लास विश्व कोष की स्थापना की जिसके कारण इसे सर्वज्ञ भी कहा जाता है। 

Pallavas and Chalukya dynasty चालूक्यों का योगदान-

चालूक्यों के समय वास्तुकला का उत्कर्ष हुआ इन्होंने द्रविड़ शैली एवं नागर शैली का मिश्रण कर बेसर शैली का विकास किया। एहोल के मंदिरों का शहर कहा जाता है यहां 70 से अधिक मंदिरों के साक्ष्य मिले हैं जिसमें चार बहुत प्रसिद्ध है- लड़खान मंदिर, हसीमल्लीगुली मंदिर, दुर्गा मंदिर और मेगुती का जैन मंदिर

बादामी का मेलागिती शिवालय तथा पापनाथ मंदिर बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। विरुपाक्ष मंदिर इसे विक्रमादित्य द्वितीय ने रानी लोकमहादेवी ने बनवाया था। त्रिलोकेश्वर महादेव मंदिर इसे विक्रमादित्य द्वितीय ने अपनी दूसरी रानी त्रिलोक महादेवी ने बनवाया था।

पल्लवों का योगदान-

द्रविड़ शैली पल्लवों के नेतृत्व में द्रविड़ शैली का विकास चार भागों में हुआ।

  • महेंद्र शैली जिसे हम मंडप शैली भी कहते हैं। शिलाकृति मककोड़ा मंदिर तथा उंडावल्ली का अनंतेश्वर मंदिर उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है।
  • नरसिंह शैली इसे महामल्ल शैली भी कहा जाता है। इसमें रथ है जो मामल्लापुरम में पाए जाते हैं। यह सप्त पैगोडा के नाम से जाने जाते हैं। किंतु वास्तव में ये आठ है धर्मराज,अर्जुन,भीम,सहदेव, द्रोपदी,गणेश, पिदारीएवं वालायान कुटिय
  • राजसिंह शैली -इस शैली का प्रयोग नरसिंहवर्मन द्वितीय ने किया।उदाहरण के रूप में देखा जाए तो महाबलीपुरम का तट, मुकुंद मंदिर ,ऐरावतेष्वर मंदिर।
  • नंदिवर्मन शैली -काँची का मुक्तेश्वर मंदिर बैकुंठ पेरुमल मंदिर ,मांगतेश्वर मंदिर,आदि।

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