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Guptas Dynasty:Learn 8 Gallant Rulers of Gupta Period

Guptas Dynasty
Guptas dynasty

Guptas Dynasty:origin of guptas dynasty& rulers-in hindi

कहते है इस धरती पर कोई भी चीज स्थाई नहीं है । इसी नियम के फलस्वरुप जब मौर्यो का पतन हुआ । तब बहुत वर्षों तक भारत कोई एक सता के अधीन नहीं रहा । पूरा भारत कई छोटे छोटे राज्यों में बट गया। कोई भी ऐसा राजा नहीं था। जो पुरे भारतवर्ष को नेतृत्व कर सके। तभी इस कमी को मगध के गुप्त शासकों ने पूरी की। शुरुवात में गुप्त किसानो के सामंत हुआ करते थे। फिर धीरे धीरे इन्होंने अपनी ताकत इतनी बढ़ा ली की इन्होने एक साम्राज्य स्थापित कर ली। जो भारत के इतिहास की दुसरी सबसे बड़ी साम्राज्य साबित हुई।

और करीबन पूरे भारत को अपने शासन प्रणाली तथा उतम शासकों की छत्र -छाया के अंतर्गत आर्थिक,सामाजिक,और साहित्य,वैज्ञानिक उपलब्धता से भारत के मान समान को शिखर तक पहुँचा दिया । जिसका प्रमाण साहित्यक,पुरातात्विक एवम् मंदिर,गुफाओ आदि तथा अनेक कलाकुर्तियों मे देखने को मिलता है ।

अगर गुप्त साम्राज्य (Guptas Dynasty)के इतिहास के स्रोत्रों की बात करें तो इनके चार स्रोत्र है

  • 1 साहित्यक -देवीचंद्रगुप्तम,मुद्राराक्षस,कामसूत्र,कालिदास की रचनाओ।
  • 2 लेख -प्रयाग प्रशिस्त,एरण अभिलेख,ताम्रपत्र,मुहरों पर लेख,विलसड स्तम्भ लेख।
  • 3 मुद्रा -सिक्के।
  • 4 यात्री विवरण -फहियान,ह्वेनसांग भारतीय इतिहास मे गुप्त काल को भारत का स्वर्णिम काल कहा जाता है ।

गुप्त साम्राज्य की उत्पति –

अगर हम गुप्त साम्राज्य की उत्पति की बात करें तो इसका कोई ठोस प्रमाण तो नहीं है पर विभिन्न लेखकों आदि के मतो की बात करे तो गुप्त साम्राज्य उत्पति के उपलक्ष मे अनेक मत है।

शूद्र जाति का होने के विषय में मत

काशी प्रसाद जयसवाल के अनुसार गुप्त वंश शूद्र जाति से सम्बन्ध रखते थे । उन्होंने कौमुदिमहाउत्सव नामक नाटक जो वज्जिका नामक किसी स्त्री की रचना थी ।उसी कथा के सारांश के अनुसार यह मत निकाला की गुप्त वंश शूद्र जाति से सम्बन्ध रखते थे । इसलिए काशी प्रसाद जयसवाल के अनुसार शायद गुप्त शासकों ने अपनी किसी भी अभिलेखों मे इनहोने जाति से संबंधित कोई जानकारी नहीं दी । अन्य प्रमाण जैसे चंद्रगोमिन के व्याकरण का एक सूत्र अजयत् जटोर हूणान को प्रमाण के रूप मे व्यक्त करते हुए कहा है, की चुकी स्कन्दगुप्त की हूणों विजय के संकेतों के आधार पर जाटों को इनका पूर्वज बताया है ।

इनके अन्य प्रमाणों की बात करें तो चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावतीगुप्त के पूना ताम्र पत्र मे प्रभावती ने अपने आप को धारण गोत्र के रूप मे अंकित किया है । जयसवाल के अनुसार धारण गोत्र जाटों की धरणि शाखा से संबंधित है । इसलिए इन्होंने गुप्त साम्राज्य को शूद्र जाती का बताया है तथा मत्स्यपुराण के एक कथन शूद्रयोनि के राजा का पृथ्वी पर शासक के रूप में कार्य करेगा। इस कथन के अनुसार इन्होंने गुप्त साम्राज्य को शूद्र जाति का बताने का प्रयास किया है ।

वैश्य होने के विषय में मत – 

एलन एस के आयंगर, रामशरण आदि के अनुसार । इनहोने विष्णुपुराण की संज्ञा देते हुए कहा है की विष्णु पुराण एक श्लोक के अनुसार जैसे ब्राह्मण अपने उपनाम मे शर्मा शब्द,क्षत्रिय वर्मा,तथा वैश्य गुप्त तथा दास शूद्र को व्यक्त करता है । इसलिए चुकी गुप्त राजा अपने उपनाम मे गुप्त को लगते थे । इसलिए यह वैश्य जाति से सम्बन्ध रखते थे ।

क्षत्रिय होने का मत

रमेशचन्द्र मजूमदार,गोरीशंकर हीराचंद्र ओझा ने क्षत्रिय के रूप मे प्रमाण देते हुए कहा है की जावा के तन्त्रिकामन्दक नामक ग्रंथ मे महाराज ऐश्रय्रपाल ने अपने आप को सूर्यवंशी यानि क्षत्रिय कुल का बताया है तथा समुन्द्रगुप्त का वंशज बताया है । इस आधार पर तथा अन्य पंचोभ (बिहार के दरभंगा जिले मे स्थित )एक लेख मे गुप्त वंश को पांडव का वंशज कहा गया है इसके आधार पर इनहे क्षत्रिय कहा गया है ।

ब्राह्मण होने का मत –

प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्र पत्र मे चुकी धारण गोत्र उल्लेख किया हुआ है । स्कंदपुराण के अनुसार धारण गोत्र ब्राह्मण के 24 गोत्रों मे 12 वा गोत्र है । तथा धारण गोत्र का सभी चरित्र और व्यवहार धारण गोत्र के चारित्रिक नियम से मिलता जुलता है । तथा इनके अनुसार यह ब्राह्मण गोत्र से होने का प्रतिपादन करते है।   

2 Rulers of Guptas dynasty

श्रीगुप्त (240 -280 ईसा)

Guptas Dynasty के संस्थापक की बात करे तो यह 240 -280 ईसा से शुरू होती है । जिसके संस्थापक श्री गुप्त रहे थे । संस्थापक होने के बाबजुद इन्को इतनी ख्याति नहीं मिली जितना चन्द्रगुप्त प्रथम को मिली । प्रभावती गुप्ता के पुना ताम्र पत्र अभिलेख मे श्रीगुप्त को आदिराज से संबोधित किया गया है । अगर गुप्त वंशावली की बात करे तो इसमें एक से एक बढ़ कर कई शासक आए । जो इस प्रकार है ।

घटोत्कचगुप्त (280-319 )

श्री गुप्त के बाद उनका पुत्र घटोत्कचगुप्त (280-319 )ईसा तक शासन में रहा । इन्होंने महाराज की उपाधि धारण की।

चन्द्रगुप्त प्रथम (319-334)

यह गुप्त वंश के पहले प्रसिद्ध शासक थे । जिसने लिच्छवि की राजकुमारी कुमार देवी से विवाह की जिससे एनके सत्ता को बल मिल । इनहोने ने ही 319-320 ईसा मे गुप्त संवत् चलाया था ।

समुन्द्रगुप्त (335 -380)ईसा

समुन्द्रगुप्त अब तक के सबसे शक्तिशाली राजाओ में से एक थे। सता सभालने के बाद इन्होंने गुप्त साम्राज्य का आपर विस्तार किया । इन्हे भारत का नेपोलियन भी कहा जाता है । इन्हें कई नामों से भी पुकार जाता था । जैसे समरशत जिसका मतलब सो युद्धों का विजेता । ऋद्धपुर अभिलेख मे समुन्द्रगुप्त को तत्पादपरिगूरहित कहा गया है ।

इनके विषय मे अन्य जानकारी हरिषेण के द्वारा रचित प्रयाग प्रशसित मे मिलती है । समुन्द्रगुप्त ने दक्षिणापथ के 12 राजाओ को परास्त कर धर्म विजय का कार्य किया । आर्यावर्त मे 9 राजाओ को परास्त कर दिगीवजयी का कार्य किया । इनहोने वन प्रदेश के सभी राजाओ को सेवक बनाया ।स्कंदगुप्त के भितरी अभिलेख से पता चलता है की । समुन्द्रगुप्त के अश्वमेघ यज्ञ भी करवाया था । एरण अभिलेख मे समुन्द्रगुप्त की पत्नी का नाम दत्तदेवी था । समुन्द्रगुप्त को कविराज भी कहा जाता था । इनहे कई सिक्कों पर वीणावादन करते भी दिखाया गया है । श्रीलंका के राजा ने गया मे भगवान बुद्ध की मंदिर बनवाने के लिए अनुमति मांगी थी । इनके कार्यकाल मे छ:प्रकार की मुद्राए मिलती थी । – गरुड़,अश्वमेघ,धनुर्धर,व्याधहंता,परसु एवम् वीणासारण

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रामगुप्त

समुन्द्रगुप्त के बाद रामगुप्त ने सता सभाली परंतु यह एक कमजोर शासक था । विशाखादत कृत देविचन्द्रगुप्तम के अनुसार रामगुप्त शकों के साथ युद्ध मे बुरी तरह पराजित हुआ था । शक राजा उसकी पत्नी ध्रुवदेवी को प्राप्त करना चाहते थे । रामगुप्त ने अपनी पत्नी को शकों को सौपने का निर्णय ले चुके थे । परंतु रामगुप्त के छोटे भाई (चन्द्रगुप्त द्वितीय ) को यह फैसला पसंद नहीं आया और वह स्त्री के वेश मे शक राजा का वध कर दिया । फिर अपने भाई की हत्या कर गद्दी पर बैठ गया । राजशेखर की काव्य मीमांसा के एस घटना का उल्लेख मिलता है ।

चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य )380 – 412 ईसा

यह समुन्द्रगुप्त और दत्तदेवी की संतान थी ।इन्हीं के शासन काल मे गुप्त साम्राज्य अपने चरम पर था । इन्हें सांची के अभिलेख मे देवराज एवम् प्रवरसेन के अभिलेख मे देवगुप्त कहा गया है । महरोली स्तम्भ लेख मे राजा चंद्र का वर्णन है जिनकी पहचान चन्द्रगुप्त द्वितीय से की गई है । इन्होंने वैवाहिक संबंध और विजय दोनों के सहारे अपने साम्राज्य की सीमा बढाई। इन्होंने अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकटक शासक रुद्र सेन द्वितीय से करवाया । वाकाटक की मदद से चन्द्रगुप्त दितीय ने शकों को पराजित किया । इसी उपलक्ष से इनहोने चांदी के सिक्के चलवाए । इसी विजय के बाद इ नहोने विक्रमदितीय की उपाधि ली । उदयगिरी अभिलेख के अनुसार चन्द्रगुप्त का उदेश्य पूरी पृथ्वी को जितना था । उसकी राजधानी पाटलीपुत्र थी। फिर भी इनहोने उज्जैन मे दूसरी राजधानी बनवाई । चन्द्रगुप्त द्वितीय वैष्णव थे। इन्होंने परमभागवत की उपाधि ली ।

कालिदासअमर सिंहशंकु
धन्वंतरिक्षपणकवेताल भट्ट
वररुचीघटकप्ररवाराहमिहिर
चन्द्रगुप्त द्वितीय के नौ रत्न

कुमारगुप्त प्रथम (415-455)ईसा

मंदसौर अभिलेख मे कुमारगुप्त के शासन का वर्णन है । सबसे अधिक अभिलेख (18) कुमारगुप्त के ही मिले है । तुमुन अभिलेख मे इनहे शरदकालीन सूर्य भी कहा गया है । नालंदा विश्वविधालय की स्थापना कुमारगुप्त प्रथम के द्वारा ही की गई थी। जिसे बखितयार खिलजी ने नष्ट कर दिया था । इनका शासन 40 बरसों का था। जिसने गुप्त साम्राज्य को अक्षुण्ण बनाया।

शासकउपाधियाँ
श्रीगुप्तआदिराज,महाराज
घटोत्कचमहाराज,
चन्द्रगुप्त प्रथममहाराजाधिराज
समुन्द्रगुप्तपराक्रमांक
चन्द्रगुप्त दितीयविक्रमादितीय
कुमारगुप्तमहेन्द्रादितीय,शक्रादित्य
स्कंदगुप्तक्रमादित्य
गुप्त शासकों द्वारा ग्रहण उपाधियाँ

स्कन्दगुप्त (455-467 ईसा )

इन्होंने क्रमादित्य की उपधि धारण की थी। जिसकी जानकारी जूनागढ अभिलेख से पता चलता है इनहोने ही सुदर्शन झील का पुनः निर्माण करवाया था । भितरी अभिलेख से पता चलता है की हूणों का आक्रमण हुआ था । तोरमण,मिहिरकुल जैसे हूणों राजाओ की जानकारी मिलती है । इनहोने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया था । विष्णुगुप्त इस वंश के अंतिम शासक थे ।

Magadha dynasty:Learn 16 mahajanapadas -In hindi

Magadha dynasty:complete history of magadha dynasty-In hindi

Magadha dynasty

दोस्तों आज के इस पोस्ट मे हम Magadha dynasty(मगध साम्राज्य की ) बात करेगे । जो सभी सिविल प्रतियोगी परीक्षों की दिष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है । मगध तथा 16 जनपदों से बहुत से महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर पूछे जाते है । अतः मैंने यह कोशिस की है सभी महत्वपूर्ण बिन्दुओ को इस पोस्ट के माध्यम से आपके सामने प्रस्तुत कर सकू ।

Magadha dynasty एक बहुत ही शक्तिशाली साम्राज्य जिसने लगभग 684-320 ईसा पूर्व तक पूरे भारतवर्ष मे शासन किया । महाकाव्य के अनुसार बृहद्रथ ने मगध की नीव रखी थी । लेकिन हर्यक वंश के बिंबिसार ने मगध का विस्तार किया । वही मगध जो आज बिहार के नाम से जाना जाता है । बिहार के पटना,गया,नालंदा,औरंगाबाद तथा उसके आसपास के क्षेत्र मे फ़ेला हुआ था ।

मगध साम्राज्य के इतिहास की बात करे तो इसका इतिहास इतना गौरवानवित रहा है । कि इसका प्रभुत्व पूरे भारतवर्ष मे पड़ा । छठी शताब्दी के पहले भारत का इतिहास 16 जनपदों के संघर्ष का इतिहास रहा है । जिसमे सभी को अपना प्रभुत्व स्थापित करने की होड मची हुई थी । जिसमे मगध अपने भौगोलिक कारणों तथा अन्य कारणों के कारण अपना साम्राज्य स्थापित करने मे सफल रहा जिससे मगध साम्रज्य की स्थापना हुई ।

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मगध साम्रज्य का उत्कर्ष Rise of magadha dynasty

मगध साम्राज्य को आगे बढ़ने का सबसे बड़ा कारण इसकी आर्थिक,प्रशासनिक तथा भौगोलिक स्थिति थी । मगध भौगोलिक रूप से गंगा,सोन,तथा गंडक नदियों के संगम पर स्थित था ।यह एक ओर जलदुर्ग द्वारा शत्रुओ से सुरक्षित था । वही दूसरी ओर जलोढ़ मिट्टी की परिपूर्ण होने की वजह से पर्याप्त मात्रा मे पैदावर होता था ।

नदियों की समीपता के कारण जलीय परिवहन द्वारा व्यापार मे सुगमता होती थी । पर्याप्त मात्रा मे पैदावर एवम् उन्नत व्यापार प्रजा को सुखी सम्पन्न बनाए हुई थी । जिससे राजा को भी समुचित रूप से कर की प्राप्ति हो पा रही थी । अतः मगध आर्थिक रूप से सुखी सम्पन्न प्रदेश था । सौभाग्य से मगध को कई सुयोग शक्तिशाली प्रशासक मिलते चले गए । जिससे क्षेत्र की सीमा मे निरंतर विस्तार होता चला गया ।

प्रमाणों की बात करे तो अथर्वेद मगध की जानकारी मिलती है । तथा अंगुतर निकाय और भगवती सूत्र मे महाजनपदों की उल्लेख मिलता है । इन दोनों साहित्य मे महाजनपद के नामों मे थोड़ी भिन्नता देखने को मिलती है । अगर बात करे महाजनपद की तो छठी शताब्दी ईसा पूर्व समस्त भारत 16 महाजनपदों मे विभक्त हो गया ।

इस काल के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओ की चर्चा भी इस पोस्ट मे हम करेगे । जो किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है । महाजनपदों मे ज्यादा राज्यों मे राजतन्त्र व्यवस्था थी । केवल कुछ राज्यों मे गणतांत्रिक व्यवस्था की भी चर्चा मिलती है ।

महाजनपदों

वर्तमान में 16 महाजनपदों में 14 महाजनपद भारत तथा 2 महाजनपद पकिस्तान क्षेत्र मे स्थित है । भारत के उतरप्रदेश मे सार्वधिक 8,बिहार मे 3 तथा राजस्थान मे 1,मध्यप्रदेश मे 1 और दक्षिण भारत मे 1 क्षेत्र पड़ते है ।

काशी महाजनपद :-

  • वर्तमान वाराणसी एवम् उसका सीमावर्ती क्षेत्र काशी महाजनपद कहलाता था ।
  • इसकी राजधानी वाराणसी थी।
  • जो वरुणा एवम् अस्सी नदियों के बीच मे थी । ।

अंग महाजनपद :-

  • इसके अंतर्गत भागलपुर और मुंगेर के क्षेत्र आते थे ।
  • इसकी राजधानी चंपा थी ।
  • एवम् इसका शासक ब्रह्यदत था ।
  • बाद मे बिंबिसार ने अंग को मगध मे मिला लिया ।

कोशल महाजनपद

  • इसके अंतर्गत फैजाबाद क्षेत्र आता है ।
  • इसकी राजधानी श्रावस्ती थी
  • सरयू नदी इसे दो भागों मे बाटती थी ।
  • उतर कौशल और दक्षिण कौशल ।
  • प्रसेनजीत यहाँ का प्रसिद्ध शासक था ।

4 वत्स महाजनपद

  • आधुनिक इलाहाबाद एवम् कोशाम्बी जिला इसके अंतर्गत था
  • इसकी राजधानी कोशाम्बी था ।
  • अवन्ती महाजनपद ने वत्स को अपने साम्राज्य मे मिला लिया था ।

5 मगध महाजनपद –

  • यह वर्तमान पटना तथा पटना के आस पास का क्षेत्र है।
  • इसकी राजधानी राजगृह (गिरिव्रज )थी ।
  • यहाँ पर सर्वप्रथम हयर्क वंश का शासन था ।

6 वजिज् महाजनपद –

  • यह आठ राज्यों का संध था ।
  • यह गणतंत्र माहाजनपद था ।
  • इसका प्रमुख संघ लिच्छवि था ।
  • जिसकी राजधानी वैशाली था ।

7 मल्ल महाजनपद –

  • मल्ल भी एक गणतांत्रिक महाजनपद था ।
  • जो आधुनिक गोरखपुर मे स्थित है ।
  • कुशीनगर /कुशवती यहाँ की राजधानी थी ।
  • मत्स्य यह राजस्थान का क्षेत्र है
  • जिसकी राजधानी विराटनगर थी ।

8 कुरु महाजनपद –

  • यह वर्तमान के हरियाणा,मेरठ,और दिल्ली का क्षेत्र है ।
  • इसकी राजधानी इंद्रप्रस्थ थी ।
  • दिल्ली का प्राचीन नाम योगिनीपुर था ।

10 चेदि महाजनपद –

  • यह वर्तमान के बुंदेलखंड मे अवस्थित है ।
  • इसकी राजधानी शक्तिमती थी ।

11 अस्मक महाजनपद –

  • यह दक्षिण भारत मे अवस्थित एक मात्र राज्य था ।
  • जिसकी राजधानी पोटना या पोटिल थी ।

12 शूरसेन महाजनपद –

  • यह उतर प्रदेश का क्षेत्र है ।
  • जिसकी राजधानी मथुरा थी ।
  • मेगास्थनीज ने इंडिका मे शूरसेन का वर्णन किया है ।

13 अवनित महाजनपद –

  • इसमे वर्तमान क्षेत्र का मध्य प्रदेश और मालवा शामिल था ।
  • इसकी दो राजधानी थी ।
  • उतरी अवन्ती की राजधानी उज्जैन था।
  • दक्षिणी अवन्ती की राजधानी महिषमती
  • मगध शासक शिशुनाग ने इसे मगध मे मिलाया था ।

14 पांचाल महाजनपद –

  • पांचाल के अंतर्गत बरेली,बदायू,एवम् फरुखाबाद शामिल था ।
  • इसकी भी दो राजधनियाँ थी ।
  • उतर की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिण की राजधानी कामिपल्य

15 गांधार महाजनपद –

  • आधुनिक पाकिस्तान का रावलपिंडी तथा पेशावर गंधार के अंतर्गत आते थे ।
  • जिसकी राजधानी तक्षशिला थी ।
  • पाणिनी यही के निवासी थे ।

16 कम्बोज महजनपद –

  • यह पाकिस्तान मे अवस्थित था
  • जिसमे राजोड़ी और हजारा आते थे ।
  • इसकी राजधानी हाटक या राजपुर कहलाते थे ।
  • यह घोड़ों के लिए प्रसिद्ध था ।

Magadha dynasty –मगध के वंशनज :-

माहाकाव्यों और ग्रंथों की माने तो बृहद्रर्थ ने मगध की स्थापना की थी । जो वसु का पुत्र और जरासंध का पिता था । जिसे आगे चलकर तीन वंशों ने आगे बढाया । जो निम्नलिखित है

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हर्यकवंश(544-492 ईसा पूर्व ) :-

जिसके संस्थापक बिबिंसार था । यह महात्मा बुद्ध का मित्र और संरक्षक था । जिसने 544-492 ईसा पूर्व तक राज्य किया । राजगृह (गिरिव्रज)उसकी राजधानी थी ।बिंबिसार को श्रेणिक (सेना रखने वाला)भी कहा जाता है । बिंबिसार ने विजय और विस्तार की नीति शुरू की बिंबिसार ने तीन शादियाँ की जिससे बिंबिसार ने अपनी स्थिति मजबूत की ।

पहला विवाह कौशल राज्य की पुत्री महाकोशला देवी से की । जिससे काशी दहेज के फलस्वरूप प्राप्त हुआ ।दूसरा विवाह लिच्छवी की राजकुमारी चेल्लना थी । जिसने अजातशत्रु को जन्म दिया । तीसरी रानी क्षेमा थी । जो मद्र कुल की राजकुमारी थी । इन विवाह के फलस्वरूप मगध का विस्तार पशिचम एवं उतर की ओर फैला । बिंबिसार ने अंग के राजा ब्रहादत की हत्या कर अंग को अपने राज्य मे शामिल कर लिया ।

अजातशत्रु (492-460 ईसा पूर्व )-

अजातशत्रु ने अपने पिता बिंबिसार की हत्या कर गद्दी पर बेठा । अजातशत्रु को कुणीक भी कहा जाता है । इसने कोशल एवम् वैशाली को पराजित कर मगध मे मिलाया । अजातशत्रु ने ही पहली बार महाशिलाकंटक तथा रथमुसलन जैसे हथियार का इस्तमाल किया । अवन्ती से रक्षा करने के लिय राजगीर की किलेबंदी करवाई । प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन अजातशत्रु ने ही करवाया ।

उदयिन (460 -444 ईसा पूर्व )-

उदयिन ने ही सर्वप्रथम पाटलीपुत्र को अपनी राजधानी बनाया । इसने ही गंगा और सोन नदी के संगम पर एक किला बनाया । इस वंश का अंतिम शासक नागदशक था ।

शिशुनाग वंश – (412 -345 ईसा पूर्व )-

शिशुनाग नागदशक का आमात्य था । इसने नागदशक की हत्या कर शिशुनाग वंश की स्थापना की । इसने वैशाली को मगध की राजधानी बनाया । शिशुनाग ने ही अवन्ती को पराजित कर मगध मे मिलाया ।

कालाशोक (394 -366 ईसा पूर्व )-

इसने पाटलीपुत्र को फिर से राजधानी मे बदला । इसी के शासनकाल मे दितीय बौद्ध संगीति हुई । नंदिवर्धन इस काल का अंतिम शासक था ।

नंदवंश (344-334 ईसा पूर्व )-

महापदमनन्द नंदवंश का स्थापक था । इसने कलिंग को मगध मे मिलाया । विजय स्मारक के रूप मे कलिंग से जिन की मूर्ति मगध ले आया था । इसने आपने आप को एकराट कहा था ।

धननंद –

यह इस वंश का अंतिम शासक था । यह सिकंदर के समकालीन था । चाणक्य ने चन्द्रगुप्त के साथ मिलकर धनंनद को पराजित कर मौर्य वंश की स्थापना की ।

सिकंदर का आक्रमण –

सिकंदर मकदूनिया का राजा फिलीप दितीय का पुत्र था । तथा अरस्तू का शिष्य था । सिकंदर ने एशिया ,तुर्की,ईरान,ईराक पर विजय प्राप्त करने के बाद 326 ईसा पूर्व खैबर दर्रा पार कर भारत पर आक्रमण किया। जिससे तक्षशिला के शासक आमिभ ने घुटने टेक दिया ।

एरियनयूनानी इतिहासकर
नियार्कससिकंदर का जल सेनापति
सेल्युकससिकंदर का सेनापति
सिकंदर के सलाहकार

हाईडेसपीज का युद्ध –

झेलम नदी के किनारे सिकंदर को पोरस का सामना करना पड़ा । परंतु पोरस की हार हुई । पर पोरस की बहादुरी को देखकर सिकंदर ने पोरस का राज्य लोटा दिया । सिकंदर की सेना ने व्यास नदी से आगे बढ़ने से इंकार कर दिया । सिकंदर भारत मे लगभग 19 महीने तक रहा । 323 ईसा पूर्व बेबीलोन मे सिकंदर की मौत हो गयी ।

सिकंदर ने पश्च्मि भारत मे कुछ उपनिवेश बसाए । काबुल मे सिकंदरिया,तथा झेलम के तट पर अपने घोड़े की याद मे बुकेफाल उपनिवेश एवम् निकाईया उपनिवेश जहां पोरस के साथ युद्ध हुआ था । सिकंदर ने नियकर्स को सिंधु नदी के मुहाने से फरात नदी के तट तक समुन्द्र तट का पता लगाने भेजा था ।

Maurya dynasty:1of the dignity enormous dynasty -In hindi

Maurya dynasty

Maurya dynasty:complete history of maurya dynasty

Maurya dynasty –धननंद जो सिकंदर के समकालीन था । जो मगध साम्राज्य के नन्दवंश का अंतिम शासक था । उसी धननंद को चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ मिलकर पराजित कर मौर्य साम्राज्य की नीव रखी । जो भारतवंश का सबसे बड़ा Maurya dynasty मौर्य साम्राज्य कहलाया । जिसने 321 ई.पूर्व से लेकर 185 ई. पूर्व तक सता मे रहा । Maurya dynasty(मौर्य सम्राज्य )की चोहदी की बात करे तो यह गंगा नदी के मैदान से शुरू होकर अफगानिस्तान तक फैली हुई थी। जिसके सभी साक्ष्य तथा सभी स्रोतों की चर्चा आज हम इस भाग के करेगे ।

मौर्य साम्राज्य के साहित्क स्रोत

अर्थशास्त्र -चाणक्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र मौर्य वंश की राजव्यवस्था की विस्तुत जानकारी देता है । यह पंद्रह भाग मे विभाजित है तथा इसमें सात अंगों का वर्णन है । राजा,मंत्री,मित्र,सेना,कोष,दुर्ग,एवम् जनपद । अर्थशास्त्र मुखयतः संस्कृत मे लिखा हुआ है ।

  • मुद्राराक्षस -इसमें नंदवंश के पतन तथा मौर्य वंश के उत्थान के बारे मे लिखा हुआ है ।
  • इंडिका -मेगास्थनीज की इंडिका मे मौर्य काल के प्रशासन,समाज,अर्थव्यवस्था पर प्रकाश डालता है
  • जसिटन -यूनानी लेखक के अनुसार चन्द्रगुप्त ने पूरे भारत पर विजय प्राप्त की ।
  • दीपवंश एवम् महावंश -इनके अनुसार अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार और प्रसार श्रीलंका तक किया।
  • जूनागढ़ अभिलेख –रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख मे चन्द्रगुप्त का वर्णन है । तथा सुदर्शन झील का भी उल्लेख है । जिसे पुषयगुप्त वेशय ने सोरक्षत क्षेत्र मे सिचाई के लिए करवाया था ।

अशोक के अभिलेख

  • अशोक के बारे मे जानकारी अशोक के अभिलेखों से मिलता है ।
  • अभिलेखों से अशोक अपनी प्रजा से संपर्क साधता था ।
  • अशोक के अभिलेख 5 प्रकार के हुआ करते थे ।
  • 1 दीर्घ शिलालेख 2 लघु शिलालेख 3 पृथक शिलालेख 4 दीर्घ स्तंभलेख 5 लघु स्तम्भ लेख ।

अशोक

  • अशोक के अभिलेख ब्राह्मी,खरओष्ठी,अरामईक एवम् ग्रीक लिपिकों मे है ।
  • ब्राह्मी लिपि बाए से दाए लिखी जाती है ।
  • खरओष्ठी लिपि दाए से बाए लिखी जाती है ।
  • अशोक के बहुत सारे अभिलेख प्रकूट भाषा मे है
  • 1837 ईस्वी मे जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा ।
  • भाब्रू अभिलेख मे अशोक ने खुद को सम्राट घोषित किया है ।
पहला शिलालेखपशुवध निषेध
दूसरा शिलालेखविदेशों मे धम्म प्रचार का वर्णन और मनुष्य और पशु चिकित्सा का वर्णन
तीसरा शिलालेखअधिकारियों को हर पाँच वर्ष मे राज्य भ्रमण करने का आग्रह
चोथा शिलालेखधम्मघोष का भेरीघोष के स्थान पर प्रतिपादन
पँचवा शिलालेखधममहापत्रों की नियुक्ति
छठा शिलालेखप्रशसनिक सुधारों का उल्लेख
सातवाँ शिलालेखअशोक के सभी धर्मों के प्रति निष्पक्षता का उल्लेख
आठवाँ शिलालेखबोधगया की यात्रा का वर्णन,तथा बिहार यात्रा के स्थान पर धम्म यात्रा का वर्णन
नवाँ शिलालेखशिष्टाचार का वर्णन
दसवाँ शिलालेख अशोक के उधम का लक्ष्य,धम्मचरण की श्रेष्ठा पर बल
ग्यारहवाँ शिलालेखअशोक के उधम का लक्ष्य,धम्मचरण की श्रेष्ठा पर बल धम्म के तत्वों पर प्रकाश
बारहवाँ शिलालेखधार्मिक सहिष्णुता पर जोड़
तेरहवाँ शिलालेखकलिंग युद्ध के पश्चात धम्म विजय की घोषणा,विदेशों मे धम्म प्रचार का वर्णन
अशोक के शिलालेख और उनका विषय

स्तम्भ लेख

  • स्तम्भ लेख की संख्या 7 है ।
  • यह विभिन्न जगहों से प्राप्त हुई है –रामपुर,दिल्ली,टोपरा,मेरठ,लोरिया -नन्दनगड़,अरेराज,कोशाम्बी,(प्रयागराज)

मौर्य की उत्पति origination of maurya dynasty

Maurya dynasty चन्द्रगुप्त मौर्य की जाति तथा उसका वंश का कोई ठोस प्रमाण नहीं है । इनके वंश से संबंधित अनेक मत है । जो इस प्रकार है

ब्राह्मण परंपरा के अनुसार शूद्रमुरा नामक स्त्री से उत्पन्न
महावंश (बोद्ध साहित्य )क्षत्रिय (गोरखपुर मे मौर्य नामक क्षत्रिय कुल )
परिशिष्ट पर्वणमोरपालक का पुत्र
मुद्रराक्षसशूद्र वंश से उत्पन्न
राजपूताना गजेटियरराजपूत

राजनैतिक इतिहास –

  • चन्द्रगुप्त मौर्य एक स्वेच्छाधारी शासक था ।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य अपने सारे अधिकार अपने हाथ मे ही रखे हुए था ।
  • 305 ईसा पूर्व मे चाणक्य की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य ने पंजाब प्रांत के यूनानी गवर्नर यूडेमस एवम् सिकंदर के उतराधिकारी सेल्यूकस को पराजित किया ।
  • संघर्ष के बाद हुई संधि के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य को –हेरात,कंधार,काबुल एवम् बलूचिस्तान के प्रदेश प्राप्त हुए ।
  • चन्द्रगुप्त ने 500 हाथी सेल्यूकस को उपहार मे दिए ।
  • सेलुक्स की पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ हुआ ।
  • सेल्यूकस ने मेगास्थनीज को अपना दूत बनाकर चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार मे भेजा ।
  • जहाँ उसने इनडिका की रचना की ।
  • प्रथम जैन संगीति चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल मे पाटलीपुत्र मे हुई ।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य के अपने अंतिम समय मे श्रवणबेलगोला (कर्नाटक )चले गए ।
  • एक जैन सन्यासी भाद्रबाहु के साथ और सल्लेखना पद्धति द्वारा अपने प्राणों का त्याग किया ।

मेगास्थनीज –

  • सेल्युकस निकेटर का दूत मेगास्थनीज सात वर्षों तक चन्द्रगुप्त मौर्य के दरवार मे रहा ।
  • मेगास्थनीज की रचना इनडिका को यूनानी लेखक एरियन,डायोडोरस,स्ट्रोबो ने अपने लेखों मे उलेख किया है ।
  • पाटलीपुत्र को पोलीमब्रोथा कहा ।
  • इसके अनुसार भारतीय समाज सात वर्गों मे बटा था
  • किसान,शिकारी,मंत्री,दार्शनिक,निरीक्षक,व्यपारी,योद्धा ।
  • इनके अनुसार भारतीय शिव और कृष्ण की पूजा करते थे ।
  • पाटलीपुत्र का प्रशासन छः समितियों मे विभक्त था ।
  • प्रत्येक समिति मे पाँच सदस्य हुआ करते थे ।
  • मेगास्थनीज ने कोटिल्य का उल्लेख नहीं किया ।

चाणक्य कोटिल्य (विष्णुगुप्त )-

  • इनके बचपन का नाम विष्णुगुप्त था ।
  • चाणक्य के अर्थशास्त्र की रचना की ।
  • अर्थशास्त्र के अनुसार राज्य के सात अंग होते है ।
  • स्वामी,अमात्य,मित्र,सेना,कोष,दुर्ग एवम् जनपद
  • चाणक्य के अनुसार राजा समाजिक व्यवस्था का संचालक होता है ।
  • चाणक्य के युद्ध के मामले मे नेतिकता को गोन रखा ।

बिन्दुसार (293 -273 )

  • चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र का नाम बिन्दुसार था ।
  • बिन्दुसार को अमित्रघात के नाम से भी जाना जाता था ।
  • यह आजीवक संप्रदाय का अनुयायी थे ।
  • तिब्बती लामा तारानाथ ने बिन्दुसार को 16 राज्य का विजेता कहा था ।
  • शुरुवात मे चाणक्य बिन्दुसार का प्रधानमंत्री हुआ करते थे ।
  • आगे चलकर खल्लटक प्रधानमंत्री हुआ ।
  • एथिनीयस के अनुसार बिन्दुसार ने एणिटयोकस -1 से मंदिरा,सूखे अंजीर और दार्शनिक भेजने को कहा ।
  • टालमी -2 ने भी डायोनिशियस को दूत बना कर भेजा ।
  • दिव्यवदान के अनुसार तक्षशीला मे दो बार विद्रोह हुआ । जिसे अशोक और सूसीम ने संभाल ।
भद्रसारवायुपूरान
अमित्रोंरोचेटसयूनानी लेखक
सिहसेनजैन ग्रंथ
अलिटरोंकेड़सस्ट्रोबों
बिंदुपालचीनी विवरण
बिन्दुसार के अन्य नाम

Maurya dynasty अशोक (273-232 ईसा पूर्व )

  • बिन्दुसार की मृत्यु के बाद अशोक शासन मे आया ।
  • अशोक की माता का नाम सुभदांगी था ।
  • सर्वप्रथम अशोक राज्य बनने से पहले तक्षशीला और अवन्ती तथा उज्जेन का गवर्नर था ।
  • असंधिमित्रा और कारूवाकी,एवम् पद्मावती अशोक की अन्य पत्निया थी ।
  • नागदेवी अशोक की एक और पत्नि थी जिससे एक पुत्र तथा एक पुत्री थी जिसका नाम महेंद्र और संघमित्रा था ।
  • अशोक ने अपने शिलालेख मे खुद को देवानांप्रिय (भगवान का प्रिय )तथा पियदस्सी से संबोधित किया ।
  • कल्हण और राजतरिगनी के अनुसार श्रीनगर की स्थापना अशोक ने करवाई ।

कलिंग का युद्ध –

  • 13 वा शिलालेख के अनुसार राजा बनने के आठ वर्षों के बाद कलिंग पर विजय प्राप्त की ।
  • हाथीगुफा के अभिलेख के अनुसार नन्दराज कलिंग का अंतिम शासक था ।
  • इस युद्ध के बाद अशोक ने हिंसा का मार्ग छोड़ अहिंसा के रास्ते पर चल पड़े ।
  • इन्होंने भेरीघोष का रास्ता छोड़ कर धम्मघोष की नीति अपनाई ।
  • ये बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध धर्म के स्थाविर शासक का अनुयायी बने ।

अशोक का धम्म –

  • धम्म नीती के फलस्वरूप सामाजिक नीति तथा नैतिक शिक्षा पर बल दिया ।
  • इन्होंने मध्य एशिया और श्रीलंका मे बौद्ध धर्म का प्रचार किया ।
  • अपने पुत्र महेंद्र तथा संघमित्रा द्वारा श्रीलंका मे बौद्ध धर्म का प्रचार करने भेजा ।
  • 5 वे शिलालेख के अनुसार धम्म के प्रचार के लिय धम्म महापत्रों की नियुक्ति की ।
  • अशोक ने ही धम्म यात्रा की शुरुवात की ।
  • आजीवकों को रहने के लिए बराबर की पहाड़ी पर गुफाओ का निर्माण करवाया ।
  • तीसरी बोद्ध संगीति अशोक के समय पाटलिपुत्र मे हुआ ।
  • यूरिपीय लेखक ने अशोक की तुलना रोमन के राजा कान्सटेनटाईन से किया ।

दशरथ –

  • अशोक के पोत्र का नाम दशरथ था ।
  • दशरथ ने भी अशोक की भाति देवनांप्रिय की उपाधि ली ।
  • दशरथ ने गया की नागार्जुन पहाड़ी पर अजीवकों के लिए गुफाओ का निर्माण कराया ।

वृहद्रथ-

  • यह अंतिम मौर्य शासक था ।
  • एक ब्राह्मण सेनापति पुषयमित्र दवार वृहद्रथ की हत्या के पश्चात नए वंश शुंग वंश की स्थापना हुआ ।

Maurya dynasty मौर्य प्रशासन –

  • राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी ।
  • राजा सर्वपरि होता था ।
  • राजा निरंकुश होता था तथा उसको प्रजा के कल्याण पर बल देने होता था ।
  • शीर्ष अधिकारी को तीर्थ या महापात्र कहे जाते थे उनका वेतन 48000 पण हुआ करता था । मतलब 3/4 तोले के बराबर चांदी का सिक्का ।
  • शासन के लिए मंत्रिपरिषद का निर्माण जरूरी था ।
  • जो राजा को सलाह देने का काम करता था ।
  • दो प्रकार के न्यायालय हुआ करते थे । एक जो फौजदारी समस्या का निपटारा करता था जो कंटकशोधन कहलाता था ।
  • तथा दूसरा धर्मसथीय जो दीवानी न्यायालय था ।

प्रांत –

Maurya dynasty-चन्द्रगुप्त के समय मे प्रांत 4 भागों मे विभक्त था । जबकि अशोक के शासन मे प्रांतों की संखया कलिंग युद्ध के बाद 5 प्रांत हो गया ।

कलिंगतोसली
उतरापथतक्षशिला
दक्षिणापथसुवरंगिरि
मध्य क्षेत्रपाटलिपुत्र
अवनतिपथउज्जेन
प्रांत और उसकी राजधानी
अधिकारीकार्य
समाहर्ताकर निर्धारण करने वाला सर्वच अधिकारी
सनिन्धाताराजकीय कोषागार और भंडागार की देख -रेख करने वाला
व्यवहारिकन्यायाधीश
धम्महापात्रसमाज मे सांमजस्य की स्थिति बनाए रखने वाला अधिकारी
अंतःमहामात्त्यधर्म -प्रचार करने वाला अधिकारी
स्त्राध्यक्षमहिला का नेतिक आचरण देखने वाला अधिकारी
रज्जुकन्याय कार्य करने वाला अधिकारी
युक्तकराज्स्व वसूली करने वाला अधिकारी
प्रदेष्टाफोजदारी विभाग का मुख्य न्यायधीश
महामत्याप्रसर्पगुप्तचर विभाग का प्रधान
अशोक के प्रमुख अधिकारी

प्रांत को आहार या विषय मे बाँटा जाता था । जिले के नीचे स्थानिक थे जहा 800 गावं हुआ करते थे । Maurya dynasty के प्रांत के प्रशासक को कुमार या आर्यपुत्र से संबोधित किया जाता था । विषयपति,विषय का मुखिया था । ग्रामिक ग्राम का प्रधान था । तथा गोप दस गाँव का शासन का कार्य देखता था ।

समिति –

  • नगर प्रशासन के लिए छः समिति थी ।
  • तथा प्रत्येक समिति मे पाँच सदस्य होते थे ।
समितिकार्य
प्रथमविदेशियों की देख-रेख
दितीयजन्म मरण की देख -रेख
तृतीयउधोग आदि का निरीक्षण
चतुर्थीवाणिज्य और व्यपार का देख-रेख
पंचमीवस्तु के विक्रय का निरीक्षण
षष्ठमविक्री कर वसूलने का अधिकारी
समितियाँ

सेना –

  • सेना को नगद वेतन मिलता था ।
  • किसानों की संख्या के बाद सिपाहीयो की संख्या होती है ।
  • अशोक के पास एक शक्तिशाली नौसेना भी थी ।
  • सेना मे 600,000 पैदल सिपाही,30,000 घुरसवार 9,000 हाथी एवम् 8,000 अश्वचलित रथ थे ।
  • सैनिक प्रशासन के लिए 30 अधिकारी की एक परिषद हुआ करती थी । जो पाँच पाँच सदस्य मे विभक्त थी ।
समितिकार्यक्षेत्र
प्रथमजल सेना
दितीययातायात की व्यवस्था
तृतीयपेदल सेना की व्यवस्था
चतुर्थअश्व सेना की देख-रेख
पंचमगज सेना की देख-रेख
षष्ठमरथ सेना की व्यवस्था
सेना की छह समितियाँ

गुप्तचर व्यवस्था –

  • महामात्प्रसर्प यह गुप्तचर विभाग का प्रधान था ।
  • गूढ़पुरुष :अर्थशास्त्र मे गुप्तचर को गूढ़पुरुष कहा जाता था ।
  • एक जगह स्थिर होकर गुप्तचरी करने वालों को संस्था
  • घूम घूम कर गुप्तचरी करने वाले को संचरा कहते थे ।

सामाजिक जीवन –

  • सामाजिक व्यवस्था वर्ण व्यवस्था पर आधारित होता है ।
  • ब्राह्मणों को स्थान उच्चतम था ।
  • दासों को किसानी के काम मे लगाया जाता था ।
  • 15 वर्ण संकर जातियाँ थी ।
  • जो अनुलोम एवम् प्रतिलोम विवाह के फलस्वरूप उत्पन हुआ था ।
  • वर्ण संकर को शूद्र के समान माना जाता है ।
अनुलोम विवाहइसमें पुरुष उच्च कुल का तथा महिला निम्न कुल की होती थी ।
प्रतिलोम विवाहइसमें पुरुष निम्न जाति का तथा महिला उच्च जाति का होता था ।
नियोग प्रथास्त्री को अपने देवर के साथ विवाह ।
विभिन प्रकार के विवाह

स्त्रियों की दशा –

  • महिलाओं को उच्च शिक्षा वर्जित थी ।
  • इन्हें सम्राट का अंगनिरीक्षक नियुक्त किया जाता था ।
  • समाज मे नियोग प्रथा का चलन था ।

Maurya dynasty आर्थिक स्थिति –

  • मौर्य काल मे राज्य आर्थिक रूप से मजबूत था ।
  • अर्थव्यवथा व्यपार,कुषि ,पशुपालन वाणिज्य पर निर्भर था ।
  • राज्य की आर्थिक काम काजों के लिए 26 अध्यक्ष नियुक्त होते थे ।
  • राज्य कुषि की उन्नति के लिए सिचाई तथा जल वितरण का उतरदायी होता था ।
  • सुदर्शन झील इसी का प्रमाण है जो सिचाई के लिए बनाई गई थी ।
  • मौर्य काल मे दो प्रकार की भूमि हुआ करती थी ।
  • एक जो राजकीय प्रभुत्व की हुआ करती थी और दूसरी निजी प्रभुत्व की हुआ करती थी ।
  • उपजाऊ तथा अच्छी मिट्टी को आदेवमातृका कहते थे ।
  • भूमि कर 1/4 से 1/6 भाग हुआ करता था ।
  • वस्त्र निर्माण भी एक प्रमुख उधोग था ,जिसके अधिकारी को सुत्राधयक्ष से संबोधित किया जाता था ।
  • जल मार्ग को प्रमुख मार्ग माना जाता था ।
  • उतरापथ एक प्रमुख राजमार्ग माना जाता था ।
  • अंतराष्टीय व्यापार भी हुआ करता था जिसमे प्रमुख रोम,फ़ारस,सीरिया,मिस्र था ।
  • ताम्रलिपित, सोपारा,एवम् भड़ोच प्रमुख बंदरगाह थे ।
  • बिक्री कर के रूप मे मूल्य का 10 वा भाग लिया जाता था ।
  • कर चोरी करने वालों के लिय मुत्युदंड की सजा होती थी ।
  • व्याज को रूपिका एवम् परीक्षण कहा जाता है ।
सुवर्णसोने के सिक्के
काषर्पणचांदी के सिक्के
धरणसिक्के
काकर्णीतांबे के छोटे सिक्के
लक्षणाध्यक्षसिक्कों को जारी करने वाले अधिकारी को लक्षणाध्यक्ष कहते थे ।
सिक्के

ललितकला एवम् वास्तुकला –

  • अशोक ने कई नगर की स्थापना की जिसमे श्रीनगर और नेपाल(ललिट पाटन ) प्रमुख थे ।
  • कुम्राहार (बिहार ) मे मौर्य काल के महल के अवशेष मिले है ।
  • पटना के निकट दीदारगंज के निकट यक्षिणी की मूर्ति मूर्तिकला का उच्चतम प्रमाण है ।
  • इसके साथ बराबर की पहाड़ी पर बना गुफा कला का उच्चतम उदाहरण है ।

अशोक के स्तम्भ

  • अशोक के स्तम्भ एक ही पत्थर को तराश कर बनाए गए है जिसे monolithic कहते है
  • जो चुनार और बलुआ पत्थर का बना हुआ है ।
  • इन स्तम्भ को केवल शीर्ष को जोड़ा गया है ।
  • जिसमे सिंह और सांड का विलक्षण वास्तुकला का प्रमाण है ।
  • सारनाथ के स्तम्भ का सिंह वास्तुकला का अद्भुत प्रमाण है ।
  • लोरिया -नंदनगढ़ का अशोक स्तंभ वास्तुकला का तथा रामपुरवा का वृषभ शीर्ष भी वास्तु शिल्प का प्रमाण है ।

स्तूप –

  • स्तूपों का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद मे मिलता है ।
  • स्तूपों का निर्माण ईटों से हुआ है ।
  • सांची का स्तूप,भरहुत का स्तम्भ तथा सारनाथ मे स्थित धर्मराजिक स्तूप का निर्माण अशोक ने करवाया ।

मौर्य काल विशिष्ट तथ्य –

  • मयूर मौर्य वंश का राजकीय चिन्ह था ।
  • भाषा पालि थी मौर्य काल की ।
  • तक्षशिला मौर्य काल की उच्च शिक्षा का केंद्र था ।
  • नंदवंश के विनाश मे चन्द्रगुप्त ने कश्मीर के राजा पर्वतक की सहायता ली थी ।
  • मोग्गलिपुत्र तिस्स ने कथा वस्तु की रचना की थी ।

Jaindharma-bhudhism: 2 magnificent dharm in India!

Jaindharma-bhudhism and Shaiv & vaishnav dharma

Jaindharma-bhudhism
Jaindharma-bhudhism

Jaindharma-bhudhism-जब गंगा के मैदान से 62 धार्मिक संप्रदाय का उदय हुआ । ईसा के छठी शतावदी पूर्व । जिसने बहुत से आडंबर को जन्म दिया । तब जैन और बौद्ध संप्रदाय एक धार्मिक सुधार के रूप मे अवतरित हुए ।जिसने सिर्फ भारत को ही नहीं पूरे विश्व को धार्मिक आडंबरों से मुक्त किया । जिससे प्रभावित होकर इतिहास के कई महान योद्धा महावीर स्वामी तथा भगवान बुद्ध के बताए मार्गों पर अग्रसर हो गए । आज भी कई देशों मे बुद्धम शरणं गछामी की गूंज सुनाई पड़ती है । तथा महावीर स्वामी के उपदेशों पर अनुक्रमण होता है । उसी भारत के प्राचीन धर्म और दर्शन की बात आज इस पोस्ट में करेगे ।

ऋषभदेवविमलनाथ
अजितनाथअनंतनाथ
संभवनाथधर्मनाथ
अभिनंदनशांतिनाथ
सुमतिनाथकुनथुनाथ
पदमप्रभुअर्रनाथ
सुपाशर्वरनाथमल्लिनाथ
चंद्रप्रभुमुनिसुब्रत
सुविधिनाथनेमिनाथ
शीतलनाथअरिष्टनेमि
श्रेयांसनाथपाशर्वनाथ
वासुपूज्यमहावीर
जैन तीर्थंकर
  • जैन धर्म -जैन धर्म जिसके प्रवर्तक ऋषभ देव थे । जिनको लोग आदिनाथ से भी संबोधित करते थे । ऋग्वेद मे ऋषभदेव और अरीक्षक्षतनेमी का उलेख मिलता है ।जैन धर्म की जन्म जिन शब्द से हुआ। जिसका मतलब विजेता से है ।
  • तीर्थंकर का मतलब मार्ग दिखाने वाला होता है ।

भगवान महावीर और जैन समुदाय -Jaindharma-bhudhism

jaindharma-bhudhism महावीर स्वामी का जन्म कुंडग्राम (वैशाली )मे हुआ । महावीर स्वामी क्षत्रिय वंश से सम्बन्ध रखते थे । इनके बचपन का नाम वर्धमान था । महावीर स्वामी के पिता का नाम सिद्धार्थ माता का नाम त्रिशला था ।पत्नी का नाम यशोदा तथा पुत्री का नाम प्रियदर्शनी था। 30 वर्ष की आयु मे गुह त्याग कर 12 वर्ष की तपश्या के बाद जूमीभक ग्राम के पास ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ । 72 वर्ष की आयु मे महावीर स्वामी का निधन हुआ । राजगृह के मल्ल शासक सुसतपाल के राज्य मे ।

जैन धर्म के पाँच महाव्रत –

  • अहिंसा – हिंसा नहीं करना ।
  • सत्य – झूठ नहीं बोलना ।
  • अस्तेय -चोरी नहीं करना ।
  • अपरिग्रह -संपति अर्जित नहीं करना।
  • ब्रह्मचर्य -इंद्रियों को नियंत्रित करना ।

चारों महाव्रत का प्रतिपादन पाशर्वनाथ ने किया । जैन धर्म के अनुसार व्यक्ति अपने ज्ञान,ध्यान और आचरण से मोक्ष प्राप्त कर सकता है जिसे त्रिरत्न कहते है । जैन धर्म के अनुसार निजल,निराहार रह कर प्राण त्याग करने को सल्लेखना कहलाता है । आंशिक ज्ञान को स्यादवाद कहते है । देवताओ का स्थान जिन के नीचे रखा । इनके अनुसार व्यक्तियों का उच्चय कुल मे जन्म पिछले जनम के पुण्य,पाप पर निर्भर करता है ।

जैन धर्म का प्रसार – ज्ञान प्राप्ति के बाद राजगुह के विपुचल पहाड़ी मे अपना पहला उपदेश दिया । प्रथम शिष्य जमाली थे जो महावीर स्वामी के दामाद थे ।चंदना पहली भिक्षुक थी । महावीर के शिष्य को गंधर कहा जाता था । शिष्यों की संख्या 11 थी । जैन धर्म के प्रचार के लिए पावापुरी की स्थापना की गई । धर्म का प्रसार प्राकृत भाषा मे था । प्रमुख शिष्य –कुंडकोलीय,कामदेव,सुरदेव,आनंद थे। लिछवि,नरेश चेतक ,चन्द्रगुप्त मोर्य ,राष्टकूट ,खारवेल,अवन्ती नरेश,चंपानरेश आदि महावीर स्वामी के अनुयायी बने ।।

जैन धर्म का विभाजन –

Jaindharma-bhudhism मगध मे एक समय 12 वर्षों का घोर अकाल पड़ा। तब बहुत से जैन भद्रबाहु के साथ कर्नाटक चले गए ।और कुछ जैन लोग स्थूलभद्र के साथ मगध मे ही रुक गए । फिर जब आकाल समाप्त हुआ तो भद्रबाहु के लोगों मगध लोटे पर स्थानीय लोगों द्वारा उनका बहीस्कार किया । जिससे जैन धर्म दो गुटों मे बट गया 1 दिगम्बर और 2 श्वेताम्बर

जैन साहित्य

प्रथम जैन संगीति (300 ईसा पूर्व )दितीय जैन संगीति (512 ईसा )
अध्यक्ष -स्थूलभद्रअध्यक्ष -देवधिधमीरणी
स्थान -पाटलिपुत्रस्थान -वल्लभी (गुजरात )
शासक -चन्द्रगुप्त मोर्य
परिणाम -जैन धर्म के दो भाग दिगम्बर,श्वेतांबर जैन धर्म मे शिक्षाओ को 12 अंगों मे बाटापरिणाम -जैन धर्म को लिपिबद्ध किया ।
जैन संगीति

Jaindharma-bhudhism जैन साहित्य को आगम कहा जाता है । जैन धर्म के ग्रंथ अर्धमागधी मे लिखे गए है । कल्पसूत्र संस्कृत मे है । जिसे भद्रबाहु के द्वारा लिखित है । भगवती सूत्र मे भगवान महावीर का वर्णन है । तथा 16 महाजनपद का भी उलेख है । जैन भिक्षुक के आचरण के नियमों का उलेलख आचारांगसूत्र मे मिलता है

भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्म – Jaindharma-bhudhism

गौतम बुद्ध – का जन्म नेपाल की तराई लुमीबनी मे 563 ईसा पूर्व मे कपिलवस्तु मे हुआ । गौतम बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोधन तथा मा का नाम माया देवी कोशल था । पत्नी का नाम यशोधरा तथा पुत्र का नाम राहुल था ।

  • महाभिनिष्क्रमन -गौतम बुद्ध ने जब जीवन से संबंधित चार दृश्य देखे जैसे बुढ़ापा,रोगी,मुतक,तथा सन्यासी तब उन्होंने घर छोडने का निर्णय लिया । उनका घर छोडना महाभिनिष्क्रमन कहलाया । घोड़ा भगवान बुद्ध के गुहत्याग का प्रतीक है । उनके घोड़े का नाम कथक और सारथी का नाम चन्ना
  • ज्ञान प्राप्ति – बुद्ध के दो गुरु हुए आलार कलाम और रुद्रक रामपुत्र । बुद्ध को निरंजना नदी (बोधगया )मे ज्ञान प्राप्त हुआ । तथा सुजाता नामक लडकी के हाथों खीर खाकर उपवास तोड़ा । ज्ञान प्राप्ति को संबोधि कहते है । तब से बुद्ध को प्रज्ञावान और पीपल के पेड़ को बोधिवृक्ष के नाम से सम्बोधित किया जाने लगा। बुद्ध को तथागत,मत्रय और शाक्यमुनि भी कहा जाता है।
  • धर्मचक्रपरिवर्तन – उपदेश देने को धर्मचक्रपरिवर्तन कहा गया है । उन्होंने प्रथम बार पाँच ब्राह्मण को उपदेश दिया था । जिसे धर्मचक्रपरिवर्तन कहा गया । बुद्ध का प्रिय शिष्य आनंद था । इसके ही कहने पर बौद्ध सभा मे स्त्रियों का प्रवेश हुआ । प्रथम शिष्या का नाम महाप्रजापती गोतमी था।
  • महापरिनिर्वाण – गौतम बुद्ध का निधन 80 वर्ष की आयु मे हुआ । सन 483 ईसा पूर्व कुशीनगर मे। स्वर्गवाश के उपरांत भगवान बुद्ध के अवशेषों को आठ भागों मे बाट कर आठ सपूतों का निर्माण किया गया । बुद्ध का भ्रगौतममण -बुद्ध ने 40 वर्ष तक भ्रमण कर उपदेश दिया । सर्वाधिक उपदेश कोशल प्रदेश की राजधानी श्रावस्ती मे दिए ।

महत्वपूर्ण घटना और उनके प्रतीक

हाथीमाता के गर्भ मे आना
कमलबुद्ध का जन्म
घोड़ागृहत्याग
बोधिवृक्षज्ञान प्राप्ति
धर्मचक्रप्रथम उपदेश
भूमिस्पर्शइंद्रियों पर विजय
एक करवट सोनामहापरिनिर्वाण
महत्वपूर्ण घटना और उनके प्रतीक

बौद्ध धर्म के सिद्धांत -bhudhism

Jaindharma-bhudhism -बुद्ध के आचार नियम और सिद्धांत उनके अनुयायी के लिए -आर्य सत्य -सांसारिक दुखों के संदर्भ मे चार सत्य 1 दुख 2 दुख समुदाय 3 दुख निरोध 4 दुख निरोधगमिनी प्रतिपदा

  • अष्टांगिक मार्ग -दुखों के निवारण के लिए बुद्ध के बताए आठ मार्ग -सम्यक दशर्ती 2 सम्यक् वाक् 3 सम्यक् आजीव 4 सम्यक् संकल्प 5 सम्यक् 6सम्यक् स्मूति 7 सम्यक्व्यायाम 8 सम्यक् समाधि।
  • निर्वाणनिर्वाण बौद्ध धर्म का परम लक्षय है । निर्वाण का मतलब जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो जाना ।
क्र. स.स्थानसमयअध्यक्षशासनकाल
प्रथम बौद्ध संगीतिराजगुह483 ई. पू .महाकस्सपअजातशत्रु
दितीय बौद्ध संगीतिवैशाली383ई. पू .साबकमीरकालाशोक
तूतीय बौद्ध संगीतिपाटलीपुत्र251 ई. पू .मोगलीपुततिस्सयअशोक
चतुर्थ बौद्ध संगीतिकुंडलवनई. की प्रथम शताब्दीवसुमित्रकनिष्क
बौद्ध संगीति
  • प्रथम बौद्ध संगीति विनय पिटक और सुत्तपिटक मे लिखे गए है ।
  • दितीय बौद्ध संगीति मे बौद्ध धर्म का विभाजन हुआ और महासंघीक और थेरावादीन् कहलाए ।
  • तूतीय बौद्ध संगीति मोगलीपुततिस्सय ने अभिधम्म पिटक का संकलन किया ।
  • चतुर्थ बौद्ध संगीति दो समुदाय मे बट गए हीनयान और महायान

बौद्ध साहित्य

बौद्ध धर्म का सबसे प्राचीन ग्रंथ त्रिपिटक है । विनयपिटक जिसमे बौद्ध धर्म का नियम है । सुतपितक धार्मिक विचारों का संग्रह । अभिधम्मपिटक -बौद्ध दर्शन का वर्णन । 16 महाजनपद का वर्णन अगुतरनीकाय मे है । दसशील निर्वाण को सरल बनाने हेतु दस सूत्र दिए जैसे – अहिंसा,सत्य,चोरी न करना ,लोभ नहीं करना,स्त्रियों से दूर रहना,असमय भोजन नहीं करना,आभूषणों का त्याग,सुगंधित पदार्थ वर्जित

त्रिरत्न -बुद्ध धर्म के तीन रत्न है बुद्ध,धम्म,संघ । बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा मे दिय । बौद्ध धर्म ईश्वर और आत्मा को नहीं मानता है । बौद्ध धर्म के मुतविक मोक्ष के लिय मौत आवश्यक नहीं है। यह जीवन मे भी प्राप्त किया जाता है । जातक मे पूर्व जन्म की कथाओ का वर्णन है ।

बौद्ध धर्म के विशिष्ट तथ्य –

Jaindharma-bhudhism महायान शाखा ने बुद्ध को भगवान के रूप मे पूजने की परंपरा शुरू की और पहली मूर्ति बनायी । महायान शाखा मे स्वर्ग और नरक की अवधारणा है । बंगाल के शेव शासक शशांक ने बोधिवृक्ष को कटवा डाला था । कनिष्ठ,हर्षवर्धन महायान शाखा के पोषक शासक थे । महायान शाखा के अंतर्गत शून्यवाद और योगाचार शामिल है । हीनयान के भी दो भाग है 1 वेभाषिक और 2 सोत्रानितक ।

Jaindharma-bhudhism- वैष्णव धर्म

इसका केंद्र विंदु विष्णु की पूजा है । भगवत संप्रदाय का प्रमुख तत्व भक्ति और अहिंसा भक्ति से तात्पर्य प्रेम,निष्ठा, निवेदन और अहिंसा का अर्थ किसी का वध नहीं करना ।वैष्णव संप्रदाय मे विष्णु के दस अवतारों का वर्णन है । विष्णु के दस अवतार है। –मत्स्य,कूर्म,वाराह,नरसिह,वामन,परशुराम,राम,बलराम,बुद्ध,और कलिक । कृष्ण का उल्लेख छान्दोग्य उपनिषेद मे मिलता है । इस धर्म का विकास गुप्त काल मे हुआ । यह बहुत ही उदार धर्म है, जिसने विदेशियों को भी प्रभावित किया ।

शैव धर्म

शैव धर्म मे शिव की उपासना होती है । मत्स्य पुराण मे शिव पूजा तथा लिंग पूजा का वर्णन मिलता है । कुछ प्रमुख शैव धर्म के उपासक जिन्होंने शैव धर्म को आगे बढ़ाया । जैसे –पशुपति,कापालिक,कालामुख,लिंगायत आदि । कापालिक संप्रदाय के ईष्ट देव भैरव देव है । तथा कलामुख के संप्रदाय के लोगों को माहव्रतधर से संबोधित किया जाता है । लिंगायत को जंगम भी कहा जाता है इसके प्रवर्तक अल्लभ प्रभु तथा शिष्य वासक थे । पाशुपत संप्रदाय के सस्थापक लकूलीश थे । नयनार संतों ने दक्षिण भारत मे शैव धर्म का प्रसार किया । नाथ संप्रदाय की स्थापना मत्स्यनद्र नाथ ने की । इसके प्रचारक बाबा गोरखनाथ थे ।

संप्रदायप्रवर्तक
आजीवकमक्खाली घोषाल
नित्यवादीपकूघ कच्यायन
संदेहवादीसंजय वेलठपुत्र
किरीयवादीपुरण कश्यप
भौतिकवादीअजीत केशकाम्बलीन
कुछ प्रमुख संप्रदाय

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Vedic kaal -period of 4 sublime vedic literature of India

Vedic kaal -period of 4 sublime vedic literature of India

Vedic Kaal
Vedic Kaal

Vedic kaal to uttar vedic kaal-ऋग्वैदिक काल से उतर वैदिक काल तक!

वेदों से Vedic kaal की जानकारी प्राप्त होती है। इस साल में ही वैदिक साहित्य का जन्म हुआ। जिस के संस्थापक आर्यों को माना जाता है। आर्य कहने का तात्पर्य श्रेष्ठ,अभिजात्य से है।

आर्य संस्कृत भाषा का शब्द है। आर्य द्वारा स्थापित संस्कृति एक ग्रामीण संस्कृति थी। चुकि आर्य को लिखने का ज्ञान ना होने के कारण यह वेद श्रवण परंपरा के आधार से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँच पाता था। अतः वेदों को श्रुति से भी संबोधित करते हैं। आगे चलकर वैदिक साहित्य को दो भागों में बांटा गया।

  • श्रुति साहित्य -(श्रवण साहित्य)- श्रुति साहित्य में वेदों के अलावा ब्राह्मण साहित्य (जो सबसे पुराना माना जाता है )और आरण्य और उपनिषद आते हैं। बहुत बाद में इन सभी को श्रवण परंपरा के माध्यम से इनका साहित्य में संकलन किया गया। जो बहुत ही अद्भुत है। वेदों का संकलन कृष्ण द्वैपायन व्यास के द्वारा हुआ था। इसलिए वह वेदव्यास कहलाए।
  • स्मृति साहित्य– मनुष्य द्वारा रचित है। इसमें वेदांग सूत्र और ग्रंथ समाहित है।

Vedic kaal वेदों की संख्या- 1 ऋग्वेद 2 सामवेद 3 यजुर्वेद 4 अर्थवेद

ऋग्वेद –

  • ऋग्वेद सबसे पुराना वेद ग्रंथ है।
  • इसमें कुल 10 मंडल है तथा कुल 10462 मंत्र है।
  • ऋग्वेद में पुरुष देवताओं की प्रधानता है।
  • इंद्र का वर्णन सबसे अधिक 250 बार किया गया है।
  • अग्नि को 200 बार लिखा गया है।
  • ऋग्वेद के मंत्रों का उच्चारण होतृ या होता द्वारा किया जाता है
  • कृषि संबंधित जानकारी चौथे मंडल में है।
  • दूसरे से सातवें मंडल को प्राचीन मंडल या फिर वंश मंडल भी कहा जाता है।
  • गायत्री मंत्र का वर्णन तीसरे मंडल में है जिसके रचिता विश्वामित्र थे।
  • कृषि संबंधित जानकारी चौथे मंडल में है
  • सातवां मंडल वरुण को समर्पित है।
  • नवे मंडल के 144 सूत्र को में सोम का वर्णन है।
  • दसवें मंडल के पुरुष सूतक में चारों वर्ण पुरोहित, राजन्य, वैश्य और शूद्र का वर्णन है
  • विदुषी महिलाओ ने लोपामुद्रा, सिक्ता,अपाला घोषा आदि की रचना की है।
  • ऋग्वेद में इन महिलाओं को ब्रह्मवादिनी कहते हैं
  • ऐतरेय एवं कोशीतकी ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ है।
  • ब्राह्मण में जनपद एवं राजस्व यज्ञ का उल्लेख मिलता है
  • ऋग्वेद में यमुना का उल्लेख तीन बार और गंगा का उल्लेख एक बार हुआ है।
  • सोमरस का वर्णन सर्वधिक बार किया गया है।
  • इंद्र को पुरंदर से संबोधित किया गया है।
  • आयुर्वेद ऋग्वेद का उपवेद है।

सामवेद –

  • सामवेद गायी जाने वाली ऋचाओ का संगलन है । जिसे उदगाता कहते है ।
  • सात स्वरों की जानकारी सबसे पहले सामवेद से ही मिली ।
  • सामवेद को भारतीय संगीत का जनक कहते है ।
  • सामवेद मे मंत्रो की संख्या 1549 है ।
  • गंधर्व वेद सामवेद का उपनिषेद है ।
  • पंचवेद या ताडय सामवेद के बाह्मण वेद है ।

यजुर्वेद

  • यजुर्वेद मे अनुष्ठानों,कर्मकांडों,तथा यज्ञ संबंधी मंत्रों का संगलन है ।
  • इसमें पुरोहित को अध्वरयु कहते है ।
  • यह गध ओर पध दोनों मे रचित है ।
  • इसके दो उपभाग है । कृष्ण यजुर्वेद ओर शुक्ल यजुर्वेद ।
  • कृष्ण यजुर्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ ततिरीय तैतिरीय ब्राह्मण तथा शुक्ल यजुर्वेद का शतपत ब्रह्माण है ।
  • इसका उपवेद धनुवेद है ।
  • इसमें कृषि और सिचाई का उलेख है ।

अथर्ववेद-

  • अथर्ववेद अथर्वा ऋषि द्वारा रचित चौथा वेद है ।
  • इसमें विवाह,जादू टोना,तथा रोग नाशक मंत्र है ।
  • अथर्ववेद मे ही गोत्र शब्द का उलेख है ।
  • इसमें पुरोहित ब्रह्मा कहते है ।
  • सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्री कहा गया है ।
  • अथर्ववेद मे चांदी और गन्ने का उल्लेख मिलता है ।
  • इसका उपवेद अर्थवेद है ।
  • अथर्ववेद का कोई आरण्य ग्रंथ नहीं है ।
वेद पुरोहित उपवेद ब्राह्मण उपनिषद
ऋग्वेद होतृआयुर्वेदऐतरेय, कौषीतकीऐतरेय,कौषीतकी
सामवेद उद्रगातागन्धर्ववेदजैमिनीय, तांडयछानदोगयोपनिषद,जैमिनीय उपनिषद
यजुवेद अधरव्यधनुर्वेदशतपथ,तैतिरीयकठोपनिषद,वउहदारण्यक,ईशोपनिषद
अथर्ववेद-ब्रह्माअर्थवेदगोपथमुंडकोपनिषद,प्रशनोपनिषद,माणडूकयोपनिषद

Vedic kaal-आरण्यक

  • ऋषियों दवार जंगल मे की जाने वाली रचनाओ को आरण्यक कहते है ।
  • इसकी संख्या सात है । यह ज्ञान और कर्म के बीच के सेतु का काम करता है ।
  • यह दार्शनिक रहस्यों का संग्रह है ।
  • इनके नाम ब्राह्मण ग्रंथ से जुड़े है जैसे ऐतरेय,वुरहदारणय,,शतपथ,कौषीतकि, उपनिषेद
  • इसे वेदान्त भी कहते है ।
  • यह दार्शनिक चिंतन का ज्ञान है ।

उपनिषद

  • उपनिषेद की संख्या 108 है ।
  • मुंडकोपनिषद से ही सत्वमेव जयते लिया गया है ।
  • इषोपनिषद मे गीता का निष्काम कर्म का पहला विवरण मिलता है ।
  • नचिकेता -यम का संवाद कठोपनिषद मे है ।
  • वृहदारण्यक उपनिषद मे अहम -ब्रह्यरिम उलेखित है ।
  • इसमें पुनर्जनम का सिद्धांत है ।
  • श्वेतासवतर उपनिषेध मे भक्ति शब्द का उलेख मिलता है ।

वेदांग –

  • वैदिक मूलग्रंथ का अर्थ समझने के लिए वेदों के अंगभूत शास्त्रों की रचना की गई ।
  • वेदांग मे हम शिक्षा,व्याकरण,निरुक्त,छन्द और ज्योतिष की जानकारी सीखते है ।

स्मृति ग्रंथ –

  • स्मृति ग्रंथ के अंतर्गत स्मृति, धर्मशास्त्र,एवं पुराण आते है।
  • यह हिन्दू धर्म ग्रंथ का कानून शास्त्र भी कहलाता है।
  • मनुस्मृति सबसे प्राचीन ग्रंथ है। मेधा तिथि,गोविंदराज,भरुचि एवं कल्लूक भट्ट,मनुस्मृति पर टिका लिखने वाले विदवान थे।
  • याज्ञवल्कय स्मृति इसमें भाष्यकार है -विज्ञानेश्वर,अपराक्र एवं विश्वरूप।
  • महाभारत यह वेदव्यास की कृति है इसमें 18 पर्व है। और इसका नाम जय सरिता था।
  • रामायण वाल्मीकि द्वारा रचित जिसमे 6000 श्लोक थे जो बढ़कर 24000 हो गए।

पुराण –

  • पुराणों की संख्या 18 है।
  • इसका संग्लन गुप्तकाल में हुआ तथा इसमें ऐतिहासिक वंशावली मिलती है।
  • मत्स्य,वायु,विष्णु ,शिव,ब्रह्माण्ड,भागवत कुछ महत्वपूर्ण पुराण है।
  • विष्णु पुराण सबसे पुराना पुराण है। जिसमे विष्णु के दस अवतार का वर्णन मिलता है।

सूत्र –

सूत्रों की संख्या 4 है।

  • 1 गृहसूत्र –इसमें जातकर्म,नामकरण ,उपनयन,विवाह आदि का विधि विधान उल्लेखित है।
  • 2 श्रोत सूत्र -इसमें यज्ञों के विधि विधान के बारे मे है ।
  • 3 धर्मसूत्र -इसमें धर्म संबंधी विभिन किर्या का वर्णन है ।
  • 4 शूलवसूत्र – जयमिति और गणित का अध्ययन यही से शुरू है ।

Vedic kaal- ऋग्वैदिक काल (1500 से 1000 ईसा पूर्व )

आर्यों का आगमन और विस्तार :आर्यों के आगमन मे मेक्समूलर का सिद्धांत सबसे सर्वमान्य है । इसकी पुष्टि जीवविज्ञानिक ने भी की है ।आनुवांशिक सकेत के आधार पर इसके आधार पर यह निष्कर्ष निकला की आर्य मध्य एशिया से भारत आए थे ।

मूलनिवास

विद्वान मूलनिवास
सम्पूर्णानन्दसप्तसैंधव प्रदेश
पेनका,हर्टजर्मनी
दयानंद सरस्वतीतिब्बत
मेक्समूलर,रीडमध्य एशिया
बालगंगाधर तिलकउतरी धुरव
मूलनिवास

ऋग्वैदिक नदियों का वर्णन

प्राचीन नाम वर्तमान नाम
सिंधुसिंधु
अरिकनीचिनाव
शतुदरीसतलज
विपाशाव्यास
वितस्ताझेलम
सरस्वती /दुर्ष्टीवतिघग्घर
परुषणीरावी
ऋग्वैदिक नदियों के नाम
  • सिंधु नदी आर्यों की सबसे महत्वपूर्ण नदी है । इसे हिरण्यानी भी कहा गया है ।
  • ऋग्वेद मे सरस्वती नदी को नदीतमा कहा गया है ।
  • सप्त सिंधु प्रदेश -आर्य सर्वप्रथम इसी प्रदेश मे आकर बसे थे ।
  • मध्य प्रदेश -हिमालय और विध्याचल के बीच का प्रदेश ।
  • ब्रह्माऋषि देश -गंगा यमुना और उसके नजदीकी क्षेत्र ।
  • गंडक को सदानीरा के नाम से जाना जाता है ।
  • नर्मदा नदी को रेवेतरा नाम से जाना जाता है ।
  • ऋग्वेद मे मरुस्थल को धन्व से संबोधित किया गया है ।
  • समुन्द्र को एक बडे जलराशि से संबोधित किया गया है ।

जनजातीय संघर्ष

  • आर्यों का संधर्ष स्थानीय जन जाति जैसे -दास,दस्यु से हुआ ।
  • परंपरा के अनुसार आर्यों के पाँच कबीले थे । जिन्हे पंचजन कहा जाता था ।
  • भरत और त्रितसू आर्यों के शासक वंश थे ।
  • भरतवंश और दश राजाओ के बीच दशराज्ञ युद्ध हुआ था । जिसका वर्णन ऋग्वेद मे है ।
  • इस युद्ध मे आर्यों के राजा सुदास थे तथा अनायो के राजा भेद थे ।
  • पराजित के राजा पुरुजन सबसे महान थे । बाद मे भरतों और पुरुओं की मित्रता से कुरु वंश की स्थापना हुई ।

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Vedic kaal सामाजिक जीवन और आर्थिक जीवन –

ऋग्वैदिक काल मे स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी । उन्हे सभा समितियों मे भाग लेना मान्य था तथा अपने पति के साथ यज्ञों मे आहुति भी दे सकती थी । ऋग्वेद मे नियोग और विधवा विवाह का प्रचालन था । अविवाहित स्त्री को अमाजू कहते थे। वर्ण व्यवस्था कर्मों पर आधारित थी । लोग शाकाहारी और मांशहारी दोनों थे । ऋग्वैदिक काल मे सामाजिक संगठन का आधार गोत्र और जनममूलक था । समाज पितृसतात्मक था । सबसे छोटी इकाई परिवार कहलाता था । जिसका प्रधान कुलप होता है ।

ऋग्वैदिक काल एक ग्रामीण सभ्यता थी ,जहाँ पशुपालन अर्थव्यवस्था का मूल रूप था तथा कृर्षि गौण कार्य था । इस काल मे गाय का विशेष महत्व था । अनेक शब्द गाय से बना था । जैसे गोधूलि,गोहना,गोमत,गविशीट,ऋग्वेद मे कृर्षि की चर्चा 24 शोलोकों मे की गई है । इस काल मे बढ़ई,रथकार,बुनकर,चमर्कर,कुम्हार आदि का वर्णन मिलता है । अयस शब्द का प्रयोग काँसे और ताँबे के रूप मे होता था ।

राजनीतिक जीवन –

ऋग्वैदिक काल मे कबीले का प्रधान राजा कहलाता था । जिसे प्रशासन का कार्य सौंपा जाता था । अनेक कुल मिलकर ग्राम और ग्राम मिलकर विश और विश मिलकर जन का निर्माण करते थे । जन शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है पर जनपद शब्द का प्रयोग एक बार भी नहीं हुआ है । समिति का प्रमुख को ईशान कहते थे । कुल मे कई संगठन थे जो विभिन विभिन कामों को देखते थे । जैसे सैनिक कार्य और धार्मिक कार्य ।

इन संगठनों का नाम सभा,समिति,विदथ और गण कहलाते थे । सभा ओर समिति का कार्य बहुत प्रमुख था । क्योंकि राजा को इन्की सहमति अनिवार्य थी । बलि राज्य को दिया जाने वाला स्वैछिक कर था । राज्य की सहायता के लिए पुरोहित नियुक्त किए जाते थे । इस काल मे वशिष्ट और विश्वामित्र नामक दो पुरोहित हुआ करते थे । सैनिक,ग्रामीण,व्रजपती आदि अन्य अधिकारी भी हुआ करते थे ।

धार्मिक जीवन –

वैदिक ग्रंथों मे 33 देवता का वर्णन है । इन्द्र को सबसे प्रतापी राज्य तथा पुरंदर भी कहा जाता था । इन्द्र पर 250 सूक्त है । इनहे बादल का देवता भी कहा जाता था । जो वर्षा का भी उत्तरदाई माना जाता है । वरुण को भी काफी महत्वपूर्ण देवता माना जाता था । जो प्रकृर्ति के संतुलन के लिए जरूरी था । वरुण का उलेख 176 बार हुआ है । अग्नि भी एक महत्वपूर्ण देवता थे । जिनका वर्णन 200 बार हुआ है ।

पिता335 बारसभा8 बार
इन्द्र250 बारसमिति9 बार
अग्नि200 बाररुद्र3 बार
गाय176 बारयमुना3 बार
सोम देवता144 बारगंगा1 बार
विष्णु100 बारसिंधु नदीसार्वधिक बार
वरुण30 बारकृर्षि33 बार
विश170 बारजन275 बार
ऋग्वेद मे उलेखित शब्दों की संखया
सोमवनस्पति के देवता
मरुतआँधी के देवता
उषाप्रगति और उत्थान की देवी
पूषनपशुओ के देवता
अरण्यानीजंगल की देवी
dhoआकाश का देवता
ऋगवेदिक देवता

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Vedic kaal उतर वैदिक काल (1000 -600 ईसा पूर्व )-सामाजिक संगठन

इस काल मे आर्यों की भौगोलिक विस्तार उतर मे हिमालय,दक्षिण मे विंध्यपर्वतमला,पशिचम मे अफगानिस्तान और पूर्व मे उतरी बिहार तक था । इस काल मे समाज चार भागों मे विभक्त था । ब्राह्मण,क्षत्रिय,वेश्य,शूद्र । ऋग्वैदिक काल मे वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित था । परंतु उतर वैदिक काल मे वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित हो गया । महिलाओ की स्थति मे भी बहुत गिरावट आ गई ।

अथवर्वेद मे कन्या के जन्म की निन्दा की है । वही एतरेय ब्रह्माण मे कन्या को चिंता का कारण बताया गया है ,वही शतपत ब्रह्माण मे कन्या को पत्नी को अर्धागनी बताया गया है । स्त्रियों को सभा मे भाग लेना बंद कर दिया गया तथा जो स्त्री पतिव्रता नहीं रह जाती थी उनके किए वरुण प्रभास सम्पन किया जाता था ।

Vedic kaal आर्थिक जीवन और राजनैतिक जीवन –

इस काल मे अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत्र कृषि था । इस काल मे कई प्रकार के फसलों का प्रयोग होने लगा । जैसे -चावल,उरद जो,गेहू आदि ।उतर वैदिक काल मे ही लोहे की जानकारी हुई जिससे कृषि सरल हो गई । इसी काल मे ताँबा भी अपने सवरूप मे आया ।1000 ईसा पूर्व मे कर्नाटक के धारवाड़ से लोहा का अवशेष मिल था । स्थाई जीवन की ओर लोग मुड़ने लगे थे ।

उतर वैदिक काल मे राजकीय प्रभुत्व सामने आया । विदथ समाप्त हो गया । इस काल मे भरत व पुरू ने मिलकर कुरु जनपद तथा तुवर्स व किरवी ने पंचाल जनपद की स्थापना की । उत्तर वैदिक राजा को विराट,सम्राट,भोज,स्वराट आदि नामों से संबोधित किया जाने लगा । राजा का पद आनुवंशिक बन गया राजा का प्रभाव उनके यज्ञों द्वारा बढ़ने लगा ।

धार्मिक जीवन और विवाह –

धर्म कर्मकाण्डों पर आधारित हो गया । इस काल मे भगवान शिव,विष्णु ब्रह्मा प्रमुख हो गए । इस काल मे गुहस्थों के लिए पंचमहा यज्ञ भी होने लगे । जबलोपनिषद मे चारों आश्रम का उल्लेख एक साथ मिलता है । उतर वैदिक काल मे ही षड्दर्शन का उदय हुआ ।

  • अनुलोम विवाह -इसमें पुरुष उच्च कुल का तथा स्त्री निम्न कुल की होती थी ।
  • प्रतिलोम विवाह -इसमें पुरुष निम्न कुल का तथा स्त्री उच्च कुल की होती थी ।
दर्शनप्रतिपादक
संखायाकपिल मुनि
योगपतंजलि
न्यायगोतम ऋषि
वएशेषिककनाद मुनि
पूर्व मीमांसाजेमिनी
उतर मीमांसावादरायण
रचियता

गुणसूत्रों के अनुसार आठ प्रकार के विवाह होते थे ।

  • 1 ब्रह्माविवाह -यह बहुत उतम विवाह है ।
  • 2 देव विवाह -यज्ञ करने वाले ब्रह्मण से पुत्री का विवाह किया जाता था ।
  • 3 आर्य विवाह – कन्या का पिता वर पछ से गाय लेकर विवाह कर देता था ।
  • 4 प्रजापत्य विवाह – कन्या का पिता वर को वचन देता था ।
  • 5 असुर विवाह – वर से मूल्य लेकर कन्या को बेचता।
  • 6 गंधर्व विवाह -यह प्रेम विवाह था जहा अभिवाभक की अनुमति जरूरी नहीं होती थी।
  • 7 राछस विवाह – वधू का अपहरण द्वारा विवाह किया जाता था ।
  • 8 पिशाच विवाह – यह जबरदस्ती किया जाने वाला विवाह था जिसमे कन्या की रजामंदी मान्य नहीं होती थी ।
सेनानी सेनापति
ग्रामीणीगाँव का मुखिया
संग्रहिताकोषाध्यक्ष
भागदुधकर संग्रहक
सूतरथ सेना का नायक
गोविकतर्नवनपाल
आक्षवापआय -व्यय गणाध्ययक्ष
पालागलविदूषक का पूर्वज
महिषीरानी
तक्षणबढई
प्रमुख रतनी

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Vedic kaal सोलह संस्कार –

उत्तर वैदिक काल में सोलह संस्कार काफी लोकप्रिय हुए थे। जैसे-

  • गर्भधान
  • पुसंवन
  • सीमांतोंनयन
  • जातकर्म
  • नामकरण
  • निष्क्रमण
  • अन्नप्राशन
  • चूड़ाकर्म
  • कर्णछेदन
  • विधाआरम्भ
  • उपनयन
  • केशान्त
  • समावर्तन
  • विवाह
  • अंत्येष्टी
  • अंत्येष्टी

उपनयन संस्कार बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार थे। यह ब्रह्मण, क्षेत्रीय, वैश्य के बच्चो में होता था।

लांगलहल
वृकबैल
उर्वराजूते हुए खेत
सीताहल से बनी नलियाँ
अवटकुआ
पर्जन्यबादल
अनसबैलगाड़ी
किनाशाहलवाहा
कृषि संबंधित शब्द